भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 252

वाक्यके मर्मको समझने तथा बोलनेमें कुशल उन समस्त दिग्गजोंने अंशुमान्‌का सत्कार किया और यह शुभ कामना प्रकट की कि तुम घोड़ेसहित लौट आओगे॥

उनका यह आशीर्वाद सुनकर अंशुमान् शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ उसके चाचा सगरपुत्र राखके ढेर हुए पड़े थे॥ १२ ॥

उनके वधसे असमंजपुत्र अंशुमान्‌को बड़ा दुःख हुआ। वह शोकके वशीभूत हो अत्यन्त आर्तभावसे फूट-फूटकर रोने लगा॥ १३ ॥

दुःख-शोकमें डूबे हुए पुरुषसिंह अंशुमान्ने अपने यज्ञ-सम्बन्धी अश्वको भी वहाँ पास ही चरते देखा॥ १४ ॥

महातेजस्वी अंशुमान्ने उन राजकुमारोंको जलाञ्जलि देनेके लिये जलकी इच्छा की; किंतु वहाँ कहीं भी कोई जलाशय नहीं दिखायी दिया॥ १५ ॥

श्रीराम! तब उसने दूरतककी वस्तुओंको देखनेमें समर्थ अपनी दृष्टिको फैलाकर देखा। उस समय उसे वायुके समान वेगशाली पक्षिराज गरुड़ दिखायी दिये, जो उसके चाचाओं (सगरपुत्रों) के मामा थे॥ १६ ॥

महाबली विनतानन्दन गरुड़ने अंशुमान्से कहा— 'पुरुषसिंह! शोक न करो। इन राजकुमारोंका वध सम्पूर्ण जगत्के मंगलके लिये हुआ है॥ १७ ॥

'विद्वन्! अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिलने इन महाबली राजकुमारोंको दग्ध किया है। इनके लिये तुम्हें लौकिक जलकी अञ्जलि देना उचित नहीं है॥ १८ ॥

'नरश्रेष्ठ! महाबाहो! हिमवान्की जो ज्येष्ठ पुत्री गंगाजी हैं, उन्हींके जलसे अपने इन चाचाओंका तर्पण करो॥ १९ ॥

'जिस समय लोकपावनी गंगा राखके ढेर होकर गिरे हुए उन साठ हजार राजकुमारोंको अपने जलसे आप्लावित करेंगी, उसी समय उन सबको स्वर्गलोकमें पहुँचा देंगी। लोककमनीया गंगाके जलसे भीगी हुई यह भस्मराशि इन सबको स्वर्गलोकमें भेज देगी॥ २० ॥

'महाभाग! पुरुषप्रवर! वीर! अब तुम घोड़ा लेकर जाओ और अपने पितामहका यज्ञ पूर्ण करो'॥ २१ ॥

गरुड़की यह बात सुनकर अत्यन्त पराक्रमी महातपस्वी अंशुमान् घोड़ा लेकर तुरंत लौट आया॥