भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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छिहत्तरवाँ सर्ग

श्रीरामके द्वारा शम्बूकका वध, देवताओंद्वारा उनकी प्रशंसा, अगस्त्‍याश्रमपर महर्षि अगस्‍त्‍यके द्वारा उनका सत्कार और उनके लिये आभूषण-दान

क्लेशरहित कर्म करनेवाले भगवान् रामका यह वचन सुनकर नीचे मस्तक किये लटका हुआ वह तथाकथित तपस्वी इस प्रकार बोला— ॥ १ ॥

‘महायशस्वी श्रीराम! मैं शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ और सदेह स्वर्गलोकमें जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूँ। इसीलिये ऐसा उग्र तप कर रहा हूँ॥ २ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मैं झूठ नहीं बोलता। देवलोकपर विजय पानेकी इच्छासे ही तपस्यामें लगा हूँ। आप मुझे शूद्र समझिये। मेरा नाम शम्बूक है’॥ ३ ॥

वह इस प्रकार कह ही रहा था कि श्रीरामचन्द्रजीने म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींच ली और उसीसे उसका सिर काट लिया॥ ४ ॥

उस शूद्रका वध होते ही इन्द्र और अग्निसहित सम्पूर्ण देवता ‘बहुत ठीक, बहुत ठीक’ कहकर भगवान् श्रीरामकी बारम्बार प्रशंसा करने लगे॥ ५ ॥

उस समय उनके ऊपर सब ओरसे वायुदेवताद्वारा बिखेरे गये दिव्य एवं परम सुगन्धित पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी॥ ६ ॥

वे सब देवता अत्यन्त प्रसन्न होकर सत्यपराक्रमी श्रीरामसे बोले—‘देव! महामते! आपने यह देवताओंका ही कार्य सम्पन्न किया है॥ ७ ॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन सौम्य श्रीराम! आपके इस सत्कर्मसे ही यह शूद्र सशरीर स्वर्गलोकमें नहीं जा सका है। अतः आप जो वर चाहें माँग लें’॥ ८ ॥

देवताओंका यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामने दोनों हाथ जोड़ सहस्रनेत्रधारी देवराज इन्द्रसे कहा—॥

‘यदि देवता मुझपर प्रसन्न हैं तो वह ब्राह्मणपुत्र जीवित हो जाय। यही मेरे लिये सबसे उत्तम और अभीष्ट वर है। देवतालोग मुझे यही वर दें॥ १० ॥

‘मेरे ही किसी अपराधसे ब्राह्मणका वह इकलौता बालक असमयमें ही कालके गालमें चला गया है॥