भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2532

अपने तेजसे प्रज्वलित-से होनेवाले महात्मा अगस्त्यका अभिवादन करके उनसे उत्तम आतिथ्य पाकर नरेश्वर श्रीराम आसनपर बैठे॥ २४ ॥

उस समय महातेजस्वी महातपस्वी कुम्भज मुनिने कहा—‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आपका स्वागत है। आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २५ ॥

‘महाराज श्रीराम! बहुत-से उत्तम गुणोंके कारण आपके लिये मेरे हृदयमें बड़ा सम्मान है। आप मेरे आदरणीय अतिथि हैं और सदा मेरे मनमें बसे रहते हैं॥ २६ ॥

‘देवतालोग कहते थे कि ‘आप अधर्मपरायण शूद्रका वध करके आ रहे हैं तथा धर्मके बलसे आपने ब्राह्मणके उस मरे हुए पुत्रको जीवित कर दिया है’॥ २७ ॥

‘रघुनन्दन! आज रातको आप मेरे ही पास इस आश्रममें निवास कीजिये। कल सबेरे पुष्पकविमानद्वारा अपने नगरको जाइयेगा। आप साक्षात् श्रीमान् नारायण हैं। सारा जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है और आप ही समस्त देवताओंके स्वामी तथा सनातन पुरुष हैं॥ २८-२९ ॥

‘सौम्य! यह विश्वकर्माका बनाया हुआ दिव्य आभूषण है, जो अपने दिव्य रूप और तेजसे प्रकाशित हो रहा है॥ ३० ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन! आप इसे लीजिये और मेरा प्रिय कीजिये; क्योंकि किसीकी दी हुई वस्तुका पुनः दान कर देनेसे महान् फलकी प्राप्ति बतायी जाती है॥ ३१ ॥

‘इस आभूषणको धारण करनेमें केवल आप ही समर्थ हैं तथा बड़े-से-बड़े फलोंकी प्राप्ति करानेकी शक्ति भी आपमें ही है। आप इन्द्र आदि देवताओंको भी तारनेमें समर्थ हैं, इसलिये नरेश्वर! यह भूषण भी मैं आपको ही दूँगा। आप इसे विधिपूर्वक ग्रहण करें’॥ ३२ १/२ ॥

तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और इक्ष्वाकुकुलके महारथी वीर श्रीरामने क्षत्रियधर्मका विचार करते हुए वहाँ महात्मा अगस्त्यजीसे कहा—‘भगवन्! दान लेनेका काम तो केवल ब्राह्मणके लिये ही निन्दित नहीं है॥ ३३-३४ ॥

‘विप्रवर! क्षत्रियोंके लिये तो प्रतिग्रह स्वीकार करना अत्यन्त निन्दित बताया गया है। फिर क्षत्रिय प्रतिग्रह—विशेषतः ब्राह्मणका दिया हुआ दान कैसे ले सकता है? यह बतानेकी कृपा करें’॥ ३५ १/२ ॥