श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदो घड़ी बीतते ही मैंने वहाँ एक दिव्य, अद्भुत, अत्यन्त उत्तम, हंसयुक्त और मनके समान वेगशाली विमान उतरता देखा। रघुनन्दन! उस विमानपर एक स्वर्गवासी देवता बैठे थे, जो अत्यन्त रूपवान् थे। वीर! वहाँ उनकी सेवामें सहस्रों अप्सराएँ बैठी थीं, जो दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थीं॥ १०-११ १/२ ॥
उनमेंसे कुछ मनोहर गीत गा रही थीं, दूसरी मृदङ्ग, वीणा और पणव आदि बाजे बजा रही थीं। अन्य बहुत-सी अप्सराएँ नृत्य करती थीं तथा प्रफुल्ल कमल-जैसे नेत्रोंवाली अन्य कितनी ही अप्सराएँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एवं चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल बहुमूल्य चवँर लेकर उन स्वर्गवासी देवताके मुखपर हवा कर रही थीं॥ १२-१३ १/२ ॥
रघुकुलनन्दन श्रीराम! तदनन्तर जैसे अंशुमाली सूर्य मेरुपर्वतके शिखरको छोड़कर नीचे उतरते हैं, उसी प्रकार उन स्वर्गवासी पुरुषने विमानसे उतरकर मेरे देखते-देखते उस शवका भक्षण किया॥ १४-१५ ॥
इच्छानुसार उस सुपुष्ट एवं प्रचुर मांसको खाकर वे स्वर्गीय देवता सरोवरमें उतरे और हाथ-मुँह धोने लगे॥ १६ ॥
रघुनन्दन! यथोचित रीतिसे कुल्ला-आचमन करके वे स्वर्गवासी पुरुष उस उत्तम एवं श्रेष्ठ विमानपर चढ़नेको उद्यत हुए॥ १७ ॥
पुरुषोत्तम! उन देवतुल्य पुरुषको विमानपर चढ़ते देख मैंने उनसे यह बात पूछी—॥ १८ ॥
‘सौम्य! देवोपम पुरुष! आप कौन हैं और किसलिये ऐसा घृणित आहार ग्रहण करते हैं? यह बतानेका कष्ट करें॥ १९ ॥
‘देवतुल्य तेजस्वी पुरुष! ऐसा दिव्य स्वरूप और ऐसा घृणित आहार किसका हो सकता है? सौम्य! आपमें ये दोनों आश्चर्यजनक बातें हैं, अतः मैं इसका यथार्थ रहस्य सुनना चाहता हूँ; क्योंकि मैं इस शवको आपके योग्य आहार नहीं मानता हूँ’॥ २० ॥
नरेश्वर! जब कौतूहलवश मैंने मधुर वाणीमें उन स्वर्गीय पुरुषसे इस प्रकार पूछा, तब मेरी बातें सुनकर उन्होंने यह सब कुछ मेरे सामने बताया॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७७॥