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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2538

‘द्विजश्रेष्ठ! परम उदार महर्षे! ब्रह्मलोकमें पहुँच जानेपर भी मुझे भूख और प्यास बड़ा कष्ट देते हैं। उससे मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठती हैं॥ ११ ॥

‘एक दिन मैंने त्रिलोकीके श्रेष्ठ देवता भगवान् ब्रह्माजीसे कहा—‘भगवन्! यह ब्रह्मलोक तो भूख-प्यासके कष्टसे रहित है, किंतु यहाँ भी क्षुधा-पिपासाका क्लेश मेरा पीछा नहीं छोड़ता है। यह मेरे किस कर्मका परिणाम है? देव! पितामह! मेरा आहार क्या है? यह मुझे बताइये’॥ १२-१३ ॥

यह सुनकर ब्रह्माजी मुझसे बोले—‘सुदेवनन्दन! तुम मर्त्यलोकमें स्थित अपने ही शरीरका सुस्वादु मांस प्रतिदिन खाया करो; यही तुम्हारा आहार है॥ १४ ॥

‘श्वेत! तुमने उत्तम तप करते हुए केवल अपने शरीरका ही पोषण किया है। महामते! दानरूपी बीज बोये बिना कहीं कुछ भी नहीं जमता—कोऽइ भी भोज्य-पदार्थ उपलब्ध नहीं होता है॥ १५ ॥

‘तुमने देवताओं, पितरों एवं अतिथियोंके लिये कभी कुछ थोड़ा-सा भी दान किया हो, ऐसा नहीं दिखायी देता। तुम केवल तपस्या करते थे। वत्स! इसीलिये ब्रह्मलोकमें आकर भी भूख-प्याससे पीड़ित हो रहे हो॥

‘नाना प्रकारके आहारोंसे भलीभाँति पोषित हुआ तुम्हारा परम उत्तम शरीर अमृतरससे युक्त होगा और उसीका भक्षण करनेसे तुम्हारी क्षुधा-पिपासाका निवारण हो जायगा॥ १७ ॥

‘श्वेत! जब उस वनमें दुर्धर्ष महर्षि अगस्त्य पधारेंगे, तब तुम इस कष्टसे छुटकारा पा जाओगे॥ १८ ॥

‘सौम्य! महाबाहो! वे देवताओंका भी उद्धार करनेमें समर्थ हैं, फिर भूख-प्यासके वशमें पड़े हुए तुम-जैसे पुरुषको संकटसे छुड़ाना उनके लिये कौन बड़ी बात है?’॥ १९ ॥

‘द्विजश्रेष्ठ! देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माका यह निश्चय सुनकर मैं अपने शरीरका ही घृणित आहार ग्रहण करने लगा॥ २० ॥

‘ब्रह्मन्! ब्रह्मर्षे! बहुत वर्षोंसे मेरे द्वारा उपभोगमें लाये जानेपर भी यह शरीर नष्ट नहीं होता है और मुझे पूर्णतः तृप्ति प्राप्त होती है॥ २१ ॥

‘मुने! इस प्रकार मैं संकटमें पड़ा हूँ। आप मेरे दृष्टिपथमें आ गये हैं, इसलिये इस कष्टसे मेरा उद्धार कीजिये। आप ब्रह्मर्षि कुम्भजके सिवा दूसरोंकी इस निर्जन वनमें पहुँच नहीं हो