भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 2621 में से

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बयालीसवाँ सर्ग

अंशुमान् और भगीरथकी तपस्या, ब्रह्माजीका भगीरथको अभीष्ट वर देकर गंगाजीको धारण करनेके लिये भगवान् शङ्करको राजी करनेके निमित्त प्रयत्न करनेकी सलाह देना

श्रीराम! सगरकी मृत्यु हो जानेपर प्रजाजनोंने परम धर्मात्मा अंशुमान्को राजा बनानेकी रुचि प्रकट की॥ १ ॥

रघुनन्दन! अंशुमान् बड़े प्रतापी राजा हुए। उनके पुत्रका नाम दिलीप था। वह भी एक महान् पुरुष था॥ २ ॥

रघुकुलको आनन्दित करनेवाले वीर! अंशुमान् दिलीपको राज्य देकर हिमालयके रमणीय शिखरपर चले गये और वहाँ अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ ३ ॥

महान् यशस्वी राजा अंशुमान्ने उस तपोवनमें जाकर बत्तीस हजार वर्षोंतक तप किया। तपस्याके धनसे सम्पन्न हुए उस नरेशने वहीं शरीर त्यागकर स्वर्गलोक प्राप्त किया॥ ४ ॥

अपने पितामहोंके वधका वृत्तान्त सुनकर महातेजस्वी दिलीप भी बहुत दुःखी रहते थे। अपनी बुद्धिसे बहुत सोचने-विचारनेके बाद भी वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके॥ ५ ॥

वे सदा इसी चिन्तामें डूबे रहते थे कि किस प्रकार पृथ्वीपर गंगाजीका उतरना सम्भव होगा? कैसे गंगाजलद्वारा उन्हें जलाञ्जलि दी जायेगी और किस प्रकार मैं अपने उन पितरोंका उद्धार कर सकूँगा॥ ६ ॥

प्रतिदिन इन्हीं सब चिन्ताओंमें पड़े हुए राजा दिलीपको, जो अपने धर्माचरणसे बहुत विख्यात थे, भगीरथ नामक एक परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त हुआ॥ ७ ॥

महातेजस्वी दिलीप ने बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान तथा तीस हजार वर्षोंतक राज्य किया॥ ८ ॥

पुरुषसिंह! उन पितरोंके उद्धारके विषयमें किसी निश्चयको न पहुँचकर राजा दिलीप रोगसे पीड़ित हो मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ९ ॥

पुत्र भगीरथको राज्यपर अभिषिक्त करके नरश्रेष्ठ राजा दिलीप अपने किये हुए पुण्यकर्मके प्रभावसे इन्द्रलोकमें गये॥ १० ॥

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