भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2543, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2543

“मेरे पिता अपनी क्रोधाग्निसे सारी त्रिलोकीको भी दग्ध कर सकते हैं; अतः सुन्दर अङ्गोंवाले नरेश! तुम बलात्कार न करो। तुम्हारे याचना करनेपर पिताजी मुझे अवश्य तुम्हारे हाथमें सौंप देंगे”॥ १२ ॥

‘जब अरजा ऐसी बातें कह रही थीं, उस समय कामके अधीन हुए दण्डने मदोन्मत्त होकर दोनों हाथ सिरपर जोड़ लिये और इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३ ॥

“सुन्दरी! कृपा करो। समय न बिताओ। वरानने! तुम्हारे लिये मेरे प्राण निकले जा रहे हैं॥ १४ ॥

“तुम्हें प्राप्त कर लेनेपर मेरा वध हो जाय अथवा मुझे अत्यन्त दारुण दुःख प्राप्त हो तो भी को◌्ऽइ चिन्ता नहीं है। भीरु! मैं तुम्हारा भक्त हूँ। अत्यन्त व्याकुल हुए मुझ अपने सेवकको स्वीकार करो”॥ १५ ॥

‘ऐसा कहकर उस बलवान् नरेशने उस भार्गव-कन्याको बलपूर्वक दोनों भुजाओंमें भर लिया। वह उसकी पकड़से छूटनेके लिये छटपटाने लगी तो भी उसने अपनी इच्छाके अनुसार उसके साथ समागम किया॥ १६ ॥

‘वह अत्यन्त दारुण एवं महाभयंकर अनर्थ करके दण्ड तुरंत ही अपने उत्तम नगर मधुमन्तको चला गया॥ १७ ॥

‘अरजा भी भयभीत हो रोती हु◌्ऽइ आश्रमके पास ही अपने देवतुल्य पिताके आनेकी राह देखने लगी’॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८० ॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण · पृष्ठ 2543, कुल 2621 में से · BharatKosha