श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘काकुत्स्थ! महाबाहो! आप उन गन्धर्वोंको जीतकर वहाँ सुन्दर गन्धर्वनगर बसाइये। अपने लिये उत्तम साधनोंसे सम्पन्न दो नगरोंका निर्माण कीजिये। वह देश बहुत सुन्दर है। वहाँ दूसरे किसीकी गति नहीं है। आप उसे अपने अधिकारमें लेना स्वीकार करें। मैं आपको ऐसी सलाह नहीं देता, जो अहितकारक हो’॥ १२-१३ ॥
महर्षि और मामाका वह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरतकी ओर देखा॥ १४ ॥
तदनन्तर श्रीराघवेन्द्रने उन ब्रह्मर्षिसे प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा—‘ब्रह्मर्षे! ये दोनों कुमार तक्ष और पुष्कल, जो भरतके वीर पुत्र हैं, उस देशमें विचरेंगे और मामासे सुरक्षित रहकर धर्मपूर्वक एकाग्रचित्त हो उस देशका शासन करेंगे॥ १५-१६ ॥
‘ये दोनों कुमार भरतको आगे करके सेना और सेवकोंके साथ वहाँ जायँगे तथा उन गन्धर्वपुत्रोंका संहार करके अलग-अलग दो नगर बसायेंगे॥ १७ ॥
‘उन दोनों श्रेष्ठ नगरोंको बसाकर उनमें अपने दोनों पुत्रोंको स्थापित करके अत्यन्त धर्मात्मा भरत फिर मेरे पास लौट आयेंगे’॥ १८ ॥
ब्रह्मर्षिसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने भरतको वहाँ सेनाके साथ जानेकी आज्ञा दी और दोनों कुमारोंका पहले ही राज्याभिषेक कर दिया॥ १९ ॥
तत्पश्चात् सौम्य नक्षत्र (मृगशिरा) में अङ्गिराके पुत्र महर्षि गार्ग्यको आगे करके सेना और कुमारोंके साथ भरतने यात्रा की॥ २० ॥
इन्द्रद्वारा प्रेरित हुई देवसेनाके समान वह सेना नगरसे बाहर निकली। भगवान् श्रीराम भी दूरतक उसके साथ-साथ गये। वह देवताओंके लिये भी दुर्जय थी॥
मांसाहारी जन्तु और बड़े-बड़े राक्षस युद्धमें रक्तपानकी इच्छासे भरतके पीछे-पीछे गये॥ २२ ॥
अत्यन्त भयंकर कई हजार मांसभक्षी भूतसमूह गन्धर्व-पुत्रोंका मांस खानेके लिये उस सेनाके साथ-साथ गये॥ २३ ॥
सिंह, बाघ, सूअर और आकाशचारी पक्षी कई हजारकी संख्यामें सेनाके आगे-आगे चले॥ २४ ॥