श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2595, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक सौ एकवाँ सर्ग
भरतका गन्धर्वोंपर आक्रमण और उनका संहार करके वहाँ दो सुन्दर नगर बसाकर अपने दोनों पुत्रोंको सौंपना और फिर अयोध्याको लौट आना
केकयराज युधाजित्ने जब सुना कि महर्षि गार्ग्यके साथ स्वयं भरत सेनापति होकर आ रहे हैं, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १ ॥
वे केकयनरेश भारी जनसमुदायके साथ निकले और भरतसे मिलकर बड़ी उतावलीके साथ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले गन्धर्वोंके देशकी ओर चले॥ २ ॥
भरत और युधाजित् दोनोंने मिलकर बड़ी तीव्रगतिसे सेना और सवारियोंके साथ गन्धर्वोंकी राजधानीपर धावा किया॥ ३ ॥
भरतका आगमन सुनकर वे महापराक्रमी गन्धर्व युद्धकी इच्छासे एकत्र हो सब ओर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ४ ॥
फिर तो दोनों ओरकी सेनाओंमें बड़ा भयंकर और रोंगटे खड़े कर देनेवाला युद्ध छिड़ गया। वह महाभयंकर संग्राम लगातार सात राततक चलता रहा, परंतु दोनोंमेंसे किसी भी एक पक्षकी विजय नहीं हुई॥ ५ ॥
चारों ओर खूनकी नदियाँ बह चलीं। तलवार, शक्ति और धनुष उस नदीमें विचरनेवाले ग्राहोंके समान जान पड़ते थे, उनकी धारामें मनुष्योंकी लाशें बह जाती थीं॥ ६ ॥
तब रामानुज भरतने कुपित होकर गन्धर्वोंपर कालदेवताके अत्यन्त भयंकर अस्त्रका, जो संवर्त नामसे प्रसिद्ध है, प्रयोग किया॥ ७ ॥
इस प्रकार महात्मा भरतने क्षणभरमें तीन करोड़ गन्धर्वोंका संहार कर डाला। वे गन्धर्व कालपाशसे बद्ध हो संवर्तास्त्रसे विदीर्ण कर डाले गये॥ ८ ॥
ऐसा भयंकर युद्ध देवताओंने भी कभी देखा हो, यह उन्हें याद नहीं आता था। पलक मारते-मारते वैसे पराक्रमी महामनस्वी समस्त गन्धर्वोंका संहार हो जानेपर कैकेयीकुमार भरतने उस समय वहाँ दो समृद्धिशाली सुन्दर नगर बसाये॥ ९-१० ॥
मनोहर गन्धर्वदेशमें तक्षशिला नामकी नगरी बसाकर उसमें उन्होंने तक्षको राजा बनाया और गान्धारदेशमें पुष्कलावत नगर बसाकर उसका राज्य पुष्कलको सौंप दिया॥ ११ ॥