श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2604, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मणकी बात सुनकर राजा श्रीराम कालको बिदा करके तुरंत ही निकले और अत्रिपुत्र दुर्वासासे मिले॥ १०॥
अपने तेजसे प्रज्वलित-से होते हुए महात्मा दुर्वासाको प्रणाम करके श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर पूछा— ‘महर्षे! मेरे लिये क्या आज्ञा है?’॥ ११॥
श्रीरघुनाथजीकी कही हुई उस बातको सुनकर प्रभावशाली मुनिवर दुर्वासा उनसे बोले— ‘धर्मवत्सल! सुनिये॥ १२॥
‘निष्पाप रघुनन्दन! मैंने एक हजार वर्षोंतक उपवास किया। आज मेरे उस व्रतकी समाप्तिका दिन है, इसलिये इस समय आपके यहाँ जो भी भोजन तैयार हो, उसे मैं ग्रहण करना चाहता हूँ’॥ १३॥
यह सुनकर राजा श्रीरघुनाथजी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उन मुनिश्रेष्ठको तैयार भोजन परोसा॥ १४॥
वह अमृतके समान अन्न ग्रहण करके दुर्वासा मुनि तृप्त हुए और श्रीरघुनाथजीको साधुवाद दे अपने आश्रमपर चले आये॥ १५॥
मुनिवर दुर्वासाके अपने आश्रमको चले जानेपर लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीराम कालके वचनोंका स्मरण करके दुःखी हो गये॥ १६॥
भयंकर भावी भ्रातृवियोगके दृश्यको दृष्टिपथमें लानेवाले कालके उस वचनपर विचार करके श्रीरामके मनमें बड़ा दुःख हुआ। उनका मुँह नीचेको झुक गया और वे कुछ बोल न सके॥ १७॥
तत्पश्चात् कालके वचनोंपर बुद्धिपूर्वक सोचविचार करके महायशस्वी श्रीरघुनाथजी इस निर्णयपर पहुँचे कि ‘अब यह सब कुछ भी न रहेगा।’ ऐसा सोचकर वे चुप हो रहे॥ १८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०५॥