श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2608, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंवसिष्ठजीके कहनेसे श्रीरघुनाथजीने प्रजाजनोंको उठाया और सबसे पूछा—'मैं आपलोगोंका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?'॥ ११ ॥
तब प्रजावर्गके सभी लोग श्रीरामसे बोले—'रघुनन्दन! आप जहाँ भी जायेंगे, आपके पीछे-पीछे हम भी वहीं चलेंगे॥ १२ ॥
'काकुत्स्थ! यदि पुरवासियोंपर आपका प्रेम है, यदि हमपर आपका परम उत्तम स्नेह है तो हमें साथ चलनेकी आज्ञा दीजिये। हम अपने स्त्री-पुत्रोंसहित आपके साथ ही सन्मार्गपर चलनेको उद्यत हैं॥ १३ ॥
'स्वामिन्! आप तपोवनमें या किसी दुर्गम स्थानमें अथवा नदी या समुद्रमें—जहाँ कहीं भी जायँ, हम सबको साथ ले चलें। यदि आप हमें त्याग देने योग्य नहीं मानते हैं तो ऐसा ही करें॥ १४ ॥
'यही हमारे ऊपर आपकी सबसे बड़ी कृपा होगी और यही हमारे लिये आपका परम उत्तम वर होगा। आपके पीछे चलनेमें ही हमें सदा हार्दिक प्रसन्नता होगी'॥ १५ ॥
पुरवासियोंकी दृढ़ भक्ति देख श्रीरामने 'तथास्तु' कहकर उनकी इच्छाका अनुमोदन किया और अपने कर्तव्यका निश्चय करके श्रीरघुनाथजीने उसी दिन दक्षिण कोशलके राज्यपर वीर कुशको और उत्तर कोशलके राजसिंहासनपर लवको अभिषिक्त कर दिया। अभिषिक्त हुए अपने उन दोनों महामनस्वी पुत्र कुश और लवको गोदमें बिठाकर उनका गाढ़ आलिङ्गन करके महाबाहु श्रीरामने बारम्बार उन दोनोंके मस्तक सूँघे; फिर उन्हें अपनी-अपनी राजधानीमें भेज दिया॥ १६—१८ ॥
उन्होंने अपने एक-एक पुत्रको कँइ हजार रथ, दस हजार हाथी और एक लाख घोड़े दिये॥ १९ ॥
दोनों भाँइ कुश और लव प्रचुर रत्न और धनसे सम्पन्न हो गये। वे हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे घिरे रहने लगे। उन दोनोंको श्रीरामने उनकी राजधानियोंमें भेज दिया॥
इस प्रकार उन दोनों वीरोंको अभिषिक्त करके अपने-अपने नगरमें भेजकर श्रीरघुनाथजीने महात्मा शत्रुघ्नके पास दूत भेजे॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०७ ॥