भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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उनकी यह बात सुनकर मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ श्रीरामने वानरराज सुग्रीवकी मित्रताका विचार करके उनसे कहा—॥ २४ ॥

‘सखे सुग्रीव! मेरी बात सुनो। मैं तुम्हारे बिना देवलोकमें और महान् परमपद या परमधाममें भी नहीं जा सकता’॥ २५ ॥

पूर्वोक्त वानरों और राक्षसोंकी भी बात सुनकर महायशस्वी श्रीरघुनाथजी ‘बहुत अच्छा’ कहकर मुसकराये और राक्षसराज विभीषणसे बोले—॥ २६ ॥

‘महापराक्रमी राक्षसराज विभीषण! जबतक संसारकी प्रजा जीवन धारण करेगी, तबतक तुम भी लङ्कामें रहकर अपने शरीरको धारण करोगे॥ २७ ॥

‘जबतक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, जबतक पृथ्वी रहेगी और जबतक संसारमें मेरी कथा प्रचलित रहेगी, तबतक इस भूतलपर तुम्हारा राज्य बना रहेगा’॥ २८ ॥

‘मैंने मित्रभावसे ये बातें तुमसे कही हैं। तुम्हें मेरी आज्ञाका पालन करना चाहिये। तुम धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो। इस समय मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हें उसका प्रतिवाद नहीं करना चाहिये॥ २९ ॥

‘महाबली राक्षसराज! इसके सिवा मैं तुमसे एक बात और कहना चाहता हूँ। हमारे इक्ष्वाकुकुलके देवता हैं भगवान् जगन्नाथ (श्रीशेषशायी भगवान् विष्णु)। इन्द्र आदि देवता भी उनकी निरन्तर आराधना करते रहते हैं। तुम भी सदा उनकी पूजा करते रहना’॥ ३० १/२ ॥

राक्षसराज विभीषणने श्रीरघुनाथजीकी इस आज्ञाको अपने हृदयमें धारण किया और ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसका पालन स्वीकार किया॥ ३१ १/२ ॥

विभीषणसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी हनुमान्‌जीसे बोले—‘तुमने दीर्घकालतक जीवित रहनेका निश्चय किया है। अपनी इस प्रतिज्ञाको व्यर्थ न करो॥ ३२ १/२ ॥

‘हरीश्वर! जबतक संसारमें मेरी कथाओंका प्रचार रहे, तबतक तुम भी मेरी आज्ञाका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहो’॥ ३३ १/२ ॥

महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्‌जीको बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले—॥ ३४ १/२ ॥

‘भगवन्! संसारमें जबतक आपकी पावन कथाका प्रचार रहेगा, तबतक आपके आदेशका पालन करता हुआ मैं इस पृथ्वीपर ही रहूँगा’॥ ३५ १/२ ॥