श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘देवताओंके इस प्रकार पुकारनेपर देवदेवेश्वर भगवान् शिव वहाँ प्रकट हुए। फिर वहीं शङ्ख-चक्रधारी भगवान् श्रीहरि भी उपस्थित हो गये॥ २२ ॥
‘श्रीहरिने त्रिशूलधारी भगवान् रुद्रसे मुसकराकर कहा—‘सुरश्रेष्ठ! देवताओंके समुद्रमन्थन करनेपर जो वस्तु सबसे पहले प्राप्त हुई है, वह आपका भाग है; क्योंकि आप सब देवताओंमें अग्रगण्य हैं। प्रभो! अग्रपूजाके रूपमें प्राप्त हुए इस विषको आप यहीं खड़े होकर ग्रहण करें’॥ २३-२४ ॥
‘ऐसा कहकर देवशिरोमणि विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। देवताओंका भय देखकर और भगवान् विष्णुकी पूर्वोक्त बात सुनकर देवेश्वर भगवान् रुद्रने उस घोर हालाहल विषको अमृतके समान मानकर अपने कण्ठमें धारण कर लिया तथा देवताओंको विदा करके वे अपने स्थानको चले गये॥ २५-२६ ॥
‘रघुनन्दन! तत्पश्चात् देवता और असुर सब मिलकर क्षीरसागरका मन्थन करने लगे। उस समय मथानी बना हुआ उत्तम पर्वत मन्दर पातालमें घुस गया॥ २७
‘तब देवता और गन्धर्व भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे—‘महाबाहो! आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति हैं। विशेषतः देवताओंके अवलम्बन तो आप ही हैं। आप हमारी रक्षा करें और इस पर्वतको उठावें’॥ २८ १/२ ॥
‘यह सुनकर भगवान् हृषीकेशने कच्छपका रूप धारण कर लिया और उस पर्वतको अपनी पीठपर रखकर वे श्रीहरि वहीं समुद्रके भीतर सो गये॥ २९ १/२ ॥
‘फिर विश्वात्मा पुरुषोत्तम भगवान् केशव उस पर्वतशिखरको हाथसे पकड़कर देवताओंके बीचमें खड़े हो स्वयं भी समुद्रका मन्थन करने लगे॥ ३० १/२ ॥
‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर उस क्षीरसागरसे एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा पुरुष प्रकट हुए, जिनके एक हाथमें दण्ड और दूसरेमें कमण्डलु था। उनका नाम धन्वन्तरि था। उनके प्राकट्यके बाद सागरसे सुन्दर कान्तिवाली बहुत-सी अप्सराएँ प्रकट हुईं॥ ३१-३२ ॥
‘नरश्रेष्ठ! मन्थन करनेसे ही अप् (जल) में उसके रससे वे सुन्दरी स्त्रियाँ उत्पन्न हुईं थीं, इसलिये अप्सरा कहलायीं॥ ३३ ॥
‘काकुत्स्थ! उन सुन्दर कान्तिवाली अप्सराओंकी संख्या साठ करोड़ थी और जो उनकी परिचारिकाएँ थीं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। वे सब असंख्य थीं॥ ३४ ॥