श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 342, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘आपका कल्याण हो। आप जैसा कहते हैं, ऐसा ही हो। ये सदा साथ रहनेवाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न कुशध्वजकी इन दोनों कन्याओं (मेंसे एक-एक) को अपनी-अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण करें॥ ११ ॥
‘महामुने! ये चारों महाबली राजकुमार एक ही दिन हमारी चारों राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करें॥ १२ ॥
‘ब्रह्मन्! अगले दो दिन फाल्गुनी नामक नक्षत्रोंसे युक्त हैं। इनमें (पहले दिन तो पूर्वा फाल्गुनी है और) दूसरे दिन (अर्थात् परसों) उत्तरा फाल्गुनी नामक नक्षत्र होगा, जिसके देवता प्रजापति भग (तथा अर्यमा) हैं। मनीषी पुरुष उस नक्षत्रमें वैवाहिक कार्य करना बहुत उत्तम बताते हैं’॥ १३ ॥
इस प्रकार सौम्य (मनोहर) वचन कहकर राजा जनक उठकर खड़े हो गये और उन दोनों मुनिवरोंसे हाथ जोड़कर बोले— ॥ १४ ॥
‘आपलोगोंने कन्याओंका विवाह निश्चित करके मेरे लिये महान् धर्मका सम्पादन कर दिया; मैं आप दोनोंका शिष्य हूँ। मुनिवरो! इन श्रेष्ठ आसनोंपर आप दोनों विराजमान हों॥ १५ ॥
‘आपके लिये जैसी राजा दशरथकी अयोध्या है, वैसी ही यह मेरी मिथिलापुरी भी है। आपका इसपर पूरा अधिकार है, इसमें संदेह नहीं; अतः आप हमें यथायोग्य आज्ञा प्रदान करते रहें’॥ १६ ॥
विदेहराज जनकके ऐसा कहनेपर रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले राजा दशरथने प्रसन्न होकर उन मिथिलानरेशको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १७ ॥
‘मिथिलेश्वर! आप दोनों भाइयोंके गुण असंख्य हैं; आपलोगोंने ऋषियों तथा राजसमूहोंका भलीभाँति सत्कार किया है॥ १८ ॥
‘आपका कल्याण हो, आप मंगलके भागी हों। अब हम अपने विश्रामस्थानको जायँगे। वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुखश्राद्धका कार्य सम्पन्न करूँगा।’ यह बात भी राजा दशरथने कही॥ १९ ॥
तदनन्तर मिथिलानरेशकी अनुमति ले महायशस्वी राजा दशरथ मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र और वसिष्ठको आगे करके तुरंत अपने आवासस्थानपर चले गये॥ २० ॥