श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरघुनाथजीने निकट आयी हुई माताके चरणोंमें प्रणाम किया और माता कौसल्याने उन्हें दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया तथा बड़े प्यारसे उनका मस्तक सूँघा॥ २१ ॥
उस समय कौसल्यादेवीने अपने दुर्जय पुत्र श्रीरामचन्द्रजीसे पुत्रस्नेहवश यह प्रिय एवं हितकर बात कही— ॥ २२ ॥
‘बेटा! तुम धर्मशील, वृद्ध एवं महात्मा राजर्षियोंके समान आयु, कीर्ति और कुलोचित धर्म प्राप्त करो॥ २३ ॥
‘रघुनन्दन! अब तुम जाकर अपने सत्यप्रतिज्ञ पिता राजाका दर्शन करो। वे धर्मात्मा नरेश आज ही तुम्हारा युवराजके पदपर अभिषेक करेंगे’॥ २४ ॥
यह कहकर माताने उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया और भोजन करनेको कहा। भोजनके लिये निमन्त्रित होकर श्रीरामने उस आसनका स्पर्शमात्र कर लिया। फिर वे अञ्जलि फैलाकर मातासे कुछ कहनेको उद्यत हुए॥
वे स्वभावसे ही विनयशील थे तथा माताके गौरवसे भी उनके सामने नतमस्तक हो गये थे। उन्हें दण्डकारण्यको प्रस्थान करना था, अतः वे उसके लिये आज्ञा लेनेका उपक्रम करने लगे॥ २६ ॥
उन्होंने कहा— ‘देवि! निश्चय ही तुम्हें मालूम नहीं है, तुम्हारे ऊपर महान् भय उपस्थित हो गया है। इस समय मैं जो बात कहने जा रहा हूँ, उसे सुनकर तुमको, सीताको और लक्ष्मणको भी दुःख होगा; तथापि कहूँगा॥
‘अब तो मैं दण्डकारण्यमें जाऊँगा, अतः ऐसे बहुमूल्य आसनकी मुझे क्या आवश्यकता है? अब मेरे लिये यह कुशकी चटाईपर बैठनेका समय आया है॥
‘मैं राजभोग्य वस्तुका त्याग करके मुनिकी भाँति कन्द, मूल और फलोंसे जीवन-निर्वाह करता हुआ चौदह वर्षोंतक निर्जन वनमें निवास करूँगा॥ २९ ॥
‘महाराज युवराजका पद भरतको दे रहे हैं और मुझे तपस्वी बनाकर दण्डकारण्यमें भेज रहे हैं॥ ३० ॥
‘अतः चौदह वर्षोंतक निर्जन वनमें रहूँगा और जंगलमें सुलभ होनेवाले वल्कल आदिको धारण करके फल-मूलके आहारसे ही जीवन-निर्वाह करता रहूँगा’॥