भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 474

‘जबतक बुद्धिमान् जगदीश्वर महाराज दशरथ जीवित हैं, तबतक हमें अपनेको अनाथ नहीं समझना चाहिये। भरत भी बड़े धर्मात्मा हैं। वे समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सदा ही धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं; अतः वे तुम्हारा अनुसरण—तुम्हारी सेवा करेंगे॥ २२ १/२ ॥

‘मेरे चले जानेपर जिस तरह भी महाराजको पुत्रशोकके कारण कोऽइ विशेष कष्ट न हो, तुम सावधानीके साथ वैसा ही प्रयत्न करना॥ २३ १/२ ॥

‘कहीं ऐसा न हो कि यह दारुण शोक इनकी जीवनलीला ही समाप्त कर डाले। जैसे भी सम्भव हो, तुम सदा सावधान रहकर बूढ़े महाराजके हित-साधनमें लगी रहना॥ २४ १/२ ॥

‘उत्कृष्ट गुण और जाति आदिकी दृष्टिसे परम उत्तम तथा व्रत-उपवासमें तत्पर होकर भी जो नारी पतिकी सेवा नहीं करती है, उसे पापियोंको मिलनेवाली गति (नरक आदि)-की प्राप्ति होती है॥ २५ १/२ ॥

‘जो अन्यान्य देवताओंकी वन्दना और पूजासे दूर रहती है, वह नारी भी केवल पतिकी सेवामात्रसे उत्तम स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेती है॥ २६ १/२ ॥

‘अतः नारीको चाहिये कि वह पतिके प्रिय एवं हितसाधनमें तत्पर रहकर सदा उसकी सेवा ही करे, यही स्त्रीका वेद और लोकमें प्रसिद्ध नित्य (सनातन) धर्म है। इसीका श्रुतियों और स्मृतियोंमें भी वर्णन है॥ २७ १/२ ॥

‘देवि! तुम्हें मेरी मङ्गल-कामनासे सदा अग्निहोत्रके अवसरोंपर पुष्पोंसे देवताओंका तथा सत्कारपूर्वक ब्राह्मणोंका भी पूजन करते रहना चाहिये॥ २८ १/२ ॥

‘इस प्रकार तुम नियमित आहार करके नियमोंका पालन करती हुऽइ स्वामीकी सेवामें लगी रहो और मेरे आगमनकी इच्छा रखकर समयकी प्रतीक्षा करो॥ २९ १/२ ॥

‘यदि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज जीवित रहेंगे तो मेरे लौट आनेपर तुम्हारी भी शुभ कामना पूर्ण होगी’॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर कौसल्याके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। वे पुत्रशोकसे पीड़ित होकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोलीं— ॥ ३१ १/२ ॥

‘बेटा! मैं तुम्हारे वनमें जानेके निश्चित विचारको नहीं पलट सकती। वीर! निश्चय ही कालकी आज्ञाका उल्लङ्घन करना अत्यन्त कठिन है॥ ३२ १/२ ॥