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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 518, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 518

‘सम्पूर्ण बन्धु-बान्धव और सदाचारी ब्राह्मण भी तुम्हारा त्याग कर देंगे। देवि! फिर इस राज्यको पाकर तुम्हें क्या आनन्द मिलेगा। ओह! तुम ऐसा मर्यादाहीन कर्म करना चाहती हो॥ १२-१३ ॥

‘मुझे तो यह देखकर आश्चर्य-सा हो रहा है कि तुम्हारे इतने बड़े अत्याचार करनेपर भी पृथ्वी तुरंत फट क्यों नहीं जाती?॥ १४ ॥

‘अथवा बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियोंके धिक्कारपूर्ण वाग्दण्ड (शाप) जो देखनेमें भयंकर और जलाकर भस्म कर देनेवाले होते हैं, श्रीरामको घरसे निकालनेके लिये तैयार खड़ी हुई तुम-जैसी पाषाणहृदयाका सर्वनाश क्यों नहीं कर डालते हैं?॥ १५ ॥

‘भला आमको कुल्हाड़ीसे काटकर उसकी जगह नीमका सेवन कौन करेगा? जो आमकी जगह नीमको ही दूधसे सींचता है, उसके लिये भी यह नीम मीठा फल देनेवाला नहीं हो सकता (अतः वरदानके बहाने श्रीरामको वनवास देकर कैकेयीके चित्तको संतुष्ट करना राजाके लिये कभी सुखद परिणामका जनक नहीं हो सकता)॥ १६ ॥

‘कैकेयि! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माताका अपने कुलके अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है। लोकमें कही जानेवाली यह कहावत सत्य ही है कि नीमसे मधु नहीं टपकता॥ १७ ॥

‘तुम्हारी माताके दुराग्रहकी बात भी हम जानते हैं। इसके विषयमें पहले जैसा सुना गया है, वह बताया जाता है। एक समय किसी वर देनेवाले साधुने तुम्हारे पिताको अत्यन्त उत्तम वर दिया था॥ १८ ॥

‘उस वरके प्रभावसे केकयनरेश समस्त प्राणियोंकी बोली समझने लगे। तिर्यक् योनिमें पड़े हुए प्राणियोंकी बातें भी उनकी समझमें आ जाती थीं॥ १९ ॥

‘एक दिन तुम्हारे महातेजस्वी पिता शय्यापर लेटे हुए थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षीकी आवाज उनके कानोंमें पड़ी। उसकी बोलीका अभिप्राय उनकी समझमें आ गया। अतः वे वहाँ कई बार हँसे॥ २० ॥

‘उसी शय्यापर तुम्हारी माँ भी सोयी थी। वह यह समझकर कि राजा मेरी ही हँसी उड़ा रहे हैं, कुपित हो उठी और गलेमें मौतकी फाँसी लगानेकी इच्छा रखती हुई बोली— ‘सौम्य! नरेश्वर! तुम्हारे हँसनेका क्या कारण है, यह मैं जानना चाहती हूँ’॥ २१ ॥

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