भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 525

⬅ विषय-सूची (TOC)

सैंतीसवाँ सर्ग

श्रीराम आदिका वल्कल-वस्त्र-धारण, सीताके वल्कल-धारणसे रनिवासकी स्त्रियोंको खेद तथा गुरु वसिष्ठका कैकेयीको फटकारते हुए सीताके वल्कल-धारणका अनौचित्य बताना

प्रधान मन्त्रीकी पूर्वोक्त बात सुनकर विनयके ज्ञाता श्रीरामने उस समय राजा दशरथसे विनीत होकर कहा—॥ १ ॥

‘राजन्! मैं भोगोंका परित्याग कर चुका हूँ। मुझे जंगलके फल-मूलोंसे जीवन-निर्वाह करना है। जब मैं सब ओरसे आसक्ति छोड़ चुका हूँ, तब मुझे सेनासे क्या प्रयोजन है?॥ २ ॥

‘जो श्रेष्ठ गजराजका दान करके उसके रस्सेमें मन लगाता है—लोभवश रस्सेको रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथीका त्याग करनेवाले पुरुषको उसके रस्सेमें आसक्ति रखनेकी क्या आवश्यकता है?॥ ३ ॥

‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज! इसी तरह मुझे सेना लेकर क्या करना है? मैं ये सारी वस्तुएँ भरतको अर्पित करनेकी अनुमति देता हूँ। मेरे लिये तो (माता कैकेयीकी दासियाँ) चीर (चिथड़े या वल्कल-वस्त्र) ला दें॥ ४ ॥

‘दासियो! जाओ, खन्ती और पेटारी अथवा कुदारी और खाँची ये दोनों वस्तुएँ लाओ। चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेके लिये ये चीजें उपयोगी हो सकती हैं’॥

कैकेयी लाज-संकोच छोड़ चुकी थी। वह स्वयं ही जाकर बहुत-सी चीर ले आयी और जनसमुदायमें श्रीरामचन्द्रजीसे बोली, ‘लो, पहन लो’॥ ६ ॥

पुरुषसिंह श्रीरामने कैकेयीके हाथसे दो चीर ले लिये और अपने महीन वस्त्र उतारकर मुनियोंके-से वस्त्र धारण कर लिये॥ ७ ॥

इसी प्रकार लक्ष्मणने भी अपने पिताके सामने ही दोनों सुन्दर वस्त्र उतारकर तपस्वियोंके-से वल्कल-वस्त्र पहन लिये॥ ८ ॥

तदनन्तर रेशमी-वस्त्र पहनने और धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाली धर्मज्ञा शुभलक्षणा जनकनन्दिनी सीता अपने पहननेके लिये भी चीरवस्त्रको प्रस्तुत देख उसी प्रकार डर गयीं, जैसे मृगी बिछे हुए जालको देखकर भयभीत हो जाती है। वे कैकेयीके हाथसे दो वल्कल-वस्त्र लेकर लज्जित-सी हो गयीं। उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ और नेत्रोंमें आँसू भर आये। उस समय उन्होंने