श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 529, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंअड़तीसवाँ सर्ग
राजा दशरथका सीताको वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयीको फटकारना और श्रीरामका उनसे कौसल्यापर कृपादृष्टि रखनेके लिये अनुरोध करना
सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथकी भाँति चीरवस्त्र धारण करने लगीं, तब सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे— ‘राजा दशरथ! तुम्हें धिक्कार है!’॥ १ ॥
वहाँ होनेवाले उस कोलाहलसे दुःखी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथने अपने जीवन, धर्म और यशकी उत्कट इच्छा त्याग दी। फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयीसे इस प्रकार बोले— ‘कैकेयि! सीता कुश-चीर (वल्कल-वस्त्र) पहनकर वनमें जानेके योग्य नहीं है॥ २-३ ॥
‘यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखोंमें ही पली है। मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वनमें जाने योग्य नहीं है॥ ४ ॥
‘राजाओंमें श्रेष्ठ जनककी यह तपस्विनी पुत्री क्या किसीका भी कुछ बिगाड़ती है? जो इस प्रकार जन-समुदायके बीच किसी किंकर्तव्यविमूढ़ भिक्षुकीके समान चीर धारण करके खड़ी है?॥ ५ ॥
‘जनकनन्दिनी अपने चीर-वस्त्र उतार डाले। ‘यह इस रूपमें वन जाय’ ऐसी कोऽइ प्रतिज्ञा मैंने पहले नहीं की है और न किसीको इस तरहका वचन ही दिया है। अतः राजकुमारी सीता सम्पूर्ण वस्त्रालंकारोंसे सम्पन्न हो सब प्रकारके रत्नोंके साथ जिस तरह भी वह सुखी रह सके, उसी तरह वनको जा सकती है॥ ६ ॥
‘मैं जीवित रहनेयोग्य नहीं हूँ। मैंने तेरे वचनोंमें बँधकर एक तो यों ही नियम (शपथ) पूर्वक बड़ी क्रूर प्रतिज्ञा कर डाली है, दूसरे तूने अपनी नादानीके कारण सीताको इस तरह चीर पहनाना प्रारम्भ कर दिया। जिस प्रकार बाँसका फूल उसीको सुखा डालता है, उसी प्रकार मेरी की हुऽइ प्रतिज्ञा मुझीको भस्म किये डालती है॥ ७ ॥
‘नीच पापिनि! यदि श्रीरामने तेरा कोऽइ अपराध किया है तो (उन्हें तो तू वनवास दे ही चुकी) विदेहनन्दिनी सीताने ऐसा दण्ड पानेयोग्य तेरा कौन-सा अपकार कर डाला है?॥ ८ ॥