भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 532

‘तुम सवारीके योग्य एक रथको उसमें उत्तम घोड़े जोतकर यहाँ ले आओ और इन महाभाग श्रीरामको उसपर बिठाकर इस जनपदसे बाहरतक पहुँचा आओ॥

‘अपने श्रेष्ठ वीर पुत्रको स्वयं माता-पिता ही जब घरसे निकालकर वनमें भेज रहे हैं, तब ऐसा मालूम होता है कि शास्त्रमें गुणवान् पुरुषोंके गुणोंका यही फल बताया जाता है’॥ ११ ॥

राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करके शीघ्रगामी सुमन्त्र गये और उत्तम घोड़ोंसे सुशोभित रथ जोतकर ले आये॥

फिर सूत सुमन्त्रने हाथ जोड़कर कहा— ‘महाराज! राजकुमार श्रीरामके लिये उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ सुवर्णभूषित रथ तैयार है’॥ १३ ॥

तब देश और कालको समझनेवाले, सब ओरसे शुद्ध (इहलोक और परलोकसे उऋण) राजा दशरथने तुरंत ही धन-संग्रहके व्यापारमें नियुक्त कोषाध्यक्षको बुलाकर यह निश्चित बात कही—॥ १४ ॥

‘तुम विदेहकुमारी सीताके पहननेयोग्य बहुमूल्य वस्त्र और महान् आभूषण जो चौदह वर्षोंके लिये पर्याप्त हों, गिनकर शीघ्र ले आओ’॥ १५ ॥

महाराजके ऐसा कहनेपर कोषाध्यक्षने खजानेमें जा वहाँसे सब चीजें लाकर शीघ्र ही सीताको समर्पित कर दीं॥ १६ ॥

उत्तम कुलमें उत्पन्न अथवा अयोनिजा और वनवासके लिये प्रस्थित विदेहकुमारी सीताने सुन्दर लक्षणोंसे युक्त अपने सभी अङ्गोंको उन विचित्र आभूषणोंसे विभूषित किया॥ १७ ॥

उन आभूषणोंसे विभूषित हुईं विदेहनन्दिनी सीता उस घरको उसी प्रकार सुशोभित करने लगीं, जैसे प्रातःकाल उगते हुए अंशुमाली सूर्यकी प्रभा आकाशको प्रकाशित करती है॥ १८ ॥

उस समय सास कौसल्याने कभी दुःखद बर्ताव न करनेवाली मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया और उनके मस्तकको सूँघकर कहा—॥ १९ ॥

‘बेटी! जो स्त्रियाँ अपने प्रियतम पतिके द्वारा सदा सम्मानित होकर भी संकटमें पड़नेपर उसका आदर नहीं करती हैं, वे इस सम्पूर्ण जगत्में ‘असती’ (दुष्टा) के नामसे पुकारी जाती हैं॥ २० ॥