भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 536

इसके बाद जैसे मातलि इन्द्रसे कोई बात कहते हैं, उसी प्रकार विनयके ज्ञाता सुमन्त्रने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामसे विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा— ॥ १० ॥

‘महायशस्वी राजकुमार श्रीराम! आपका कल्याण हो। आप इस रथपर बैठिये। आप मुझसे जहाँ कहेंगे, वहीं मैं शीघ्र आपको पहुँचा दूँगा॥ ११ ॥

‘आपको जिन चौदह वर्षोंतक वनमें रहना है, उनकी गणना आजसे ही आरम्भ हो जानी चाहिये; क्योंकि देवी कैकेयीने आज ही आपको वनमें जानेके लिये प्रेरित किया है’॥ १२ ॥

तब सुन्दरी सीता अपने अङ्गोंमें उत्तम अलंकार धारण करके प्रसन्न चित्तसे उस सूर्यके समान तेजस्वी रथपर आरूढ़ हुईं॥ १३ ॥

पतिके साथ जानेवाली सीताके लिये उनके श्वशुरने वनवासकी वर्षसंख्या गिनकर उसके अनुसार ही वस्त्र और आभूषण दिये थे॥ १४ ॥

इसी प्रकार महाराजने दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणके लिये जो बहुत-से अस्त्र-शस्त्र और कवच प्रदान किये थे, उन्हें रथके पिछले भागमें रखकर उन्होंने चमड़ेसे मढ़ी हुई पिटारी और खन्ती या कुदारी भी उसीपर रख दी॥ १५ ॥

इसके बाद दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस अग्निके समान दीप्तिमान् सुवर्णभूषित रथपर शीघ्र ही आरूढ़ हो गये॥ १६ ॥

जिनमें सीताकी संख्या तीसरी थी, उन श्रीराम आदिको रथपर आरूढ़ हुआ देख सारथि सुमन्त्रने रथको आगे बढ़ाया। उसमें जुते हुए वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंको हाँका॥ १७ ॥

जब श्रीरामचन्द्रजी सुदीर्घकालके लिये महान् वनकी ओर जाने लगे, उस समय समस्त पुरवासियों, सैनिकों तथा दर्शकरूपमें आये हुए बाहरी लोगोंको भी मूर्च्छा आ गयी॥ १८ ॥

उस समय सारी अयोध्यामें महान् कोलाहल मच गया। सब लोग व्याकुल होकर घबरा उठे। मतवाले हाथी श्रीरामके वियोगसे कुपित हो उठे और इधर-उधर भागते हुए घोड़ोंके हिनहिनाने एवं उनके आभूषणोंके खनखनानेकी आवाज सब ओर गूँजने लगी॥ १९ ॥

अयोध्यापुरीके आबाल वृद्ध सब लोग अत्यन्त पीड़ित होकर श्रीरामके ही पीछे दौड़े, मानो धूपसे पीड़ित हुए प्राणी पानीकी ओर भागे जाते हों॥ २० ॥