भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 551

‘वे पुरुषसिंह श्रीराम बड़े शूरवीर हैं। वे अपने ही बाहुबलका आश्रय लेकर जैसे महलमें रहते थे, उसी तरह वनमें भी निडर होकर रहेंगे॥ १२ ॥

‘जिनके बाणोंका लक्ष्य बनकर सभी शत्रु विनाशको प्राप्त होते हैं, उनके शासनमें यह पृथ्वी और यहाँके प्राणी कैसे नहीं रहेंगे?॥ १३ ॥

‘श्रीरामकी जैसी शारीरिक शोभा है, जैसा पराक्रम है और जैसी कल्याणकारिणी शक्ति है, उससे जान पड़ता है कि वे वनवाससे लौटकर शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे॥ १४ ॥

‘देवि! श्रीराम सूर्यके भी सूर्य (प्रकाशक) और अग्निके भी अग्नि (दाहक) हैं। वे प्रभुके भी प्रभु, लक्ष्मीकी भी उत्तम लक्ष्मी और क्षमाकी भी क्षमा हैं। इतना ही नहीं—वे देवताओंके भी देवता तथा भूतोंके भी उत्तम भूत हैं। वे वनमें रहें या नगरमें, उनके लिये कौन-से चराचर प्राणी दोषावह हो सकते हैं॥ १५-१६ ॥

‘पुरुषशिरोमणि श्रीराम शीघ्र ही पृथ्वी, सीता और लक्ष्मी—इन तीनोंके साथ राज्यपर अभिषिक्त होंगे॥ १७ ॥

जिनको नगरसे निकलते देख अयोध्याका सारा जनसमुदाय शोकके वेगसे आहत हो नेत्रोंसे दुःखके आँसू बहा रहा है, कुश और चीर धारण करके वनको जाते हुए जिन अपराजित नित्यविजयी वीरके पीछे-पीछे सीताके रूपमें साक्षात् लक्ष्मी ही गयी है, उनके लिये क्या दुर्लभ है?॥ १८-१९ ॥

‘जिनके आगे धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ लक्ष्मण स्वयं बाण और खड्ग आदि अस्त्र लिये जा रहे हैं, उनके लिये जगतमें कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?॥ २० ॥

‘देवि! मैं तुमसे सत्य कहती हूँ। तुम वनवासकी अवधि पूर्ण होनेपर यहाँ लौटे हुए श्रीरामको फिर देखोगी, इसलिये तुम शोक और मोह छोड़ दो॥ २१ ॥

‘कल्याणि! अनिन्दिते! तुम नवोदित चन्द्रमाके समान अपने पुत्रको पुनः अपने चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करते देखोगी॥ २२ ॥

‘राजभवनमें प्रविष्ट होकर पुनः राजपदपर अभिषिक्त हुए अपने पुत्रको बड़ी भारी राजलक्ष्मीसे सम्पन्न देखकर तुम शीघ्र ही अपने नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाओगी॥ २३ ॥

‘देवि! श्रीरामके लिये तुम्हारे मनमें शोक और दुःख नहीं होना चाहिये; क्योंकि उनमें कोऽइ अशुभ बात नहीं दिखायी देती। तुम सीता और लक्ष्मणके साथ अपने पुत्र श्रीरामको