भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 567

दीर्घकालतक चलकर उन्होंने समुद्रगामिनी गोमती नदीको पार किया, जो शीतल जलका स्रोत बहाती थी। उसके कछारमें बहुत-सी गौएँ विचरती थीं॥ ११ ॥

शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा गोमती नदीको लाँघ करके श्रीरघुनाथजीने मोरों और हंसोंके कलरवोंसे व्याप्त स्यन्दिका नामक नदीको भी पार किया॥ १२ ॥

वहाँ जाकर श्रीरामने धन-धान्यसे सम्पन्न और अनेक अवान्तर जनपदोंसे घिरी हुई भूमिका सीताको दर्शन कराया, जिसे पूर्वकालमें राजा मनुने इक्ष्वाकुको दिया था॥ १३ ॥

फिर श्रीमान् पुरुषोत्तम श्रीरामने ‘सूत!’ कहकर सारथिको बारंबार सम्बोधित किया और मदमत्त हंसके समान मधुर स्वरमें इस प्रकार कहा— ॥ १४ ॥

‘सूत! मैं कब पुनः लौटकर माता-पितासे मिलूँगा और सरयूके पार्श्ववर्ती पुष्पित वनमें मृगयाके लिये भ्रमण करूँगा?॥ १५ ॥

‘मैं सरयूके वनमें शिकार खेलनेकी बहुत अधिक अभिलाषा नहीं रखता। यह लोकमें एक प्रकारकी अनुपम क्रीड़ा है, जो राजर्षियोंके समुदायको अभिमत है॥ १६ ॥

‘इस लोकमें वनमें जाकर शिकार खेलना राजर्षियोंकी क्रीड़ाके लिये प्रचलित हुआ था। अतः मनुपुत्रोंद्वारा उस समय की गयी यह क्रीड़ा अन्य धनुर्धरोंको भी अभीष्ट हुई’ ॥ १७ ॥

इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी विभिन्न विषयोंको लेकर सूतसे मधुर वाणीमें उपयुक्त बातें कहते हुए उस मार्गपर बढ़ते चले गये॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४९॥