भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 570

कहीं तटवर्ती वृक्ष मालाकार होकर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। कहीं तो उनका जल खिले हुए उत्पलोंसे आच्छादित है और कहीं कमलवनोंसे व्याप्त॥ २० ॥

कहीं कुमुदसमूह तथा कहीं कलिकाएँ उन्हें सुशोभित करती हैं। कहीं नाना प्रकारके पुष्पोंके परागोंसे व्याप्त होकर वे मदमत्त नारीके समान प्रतीत होती हैं॥

वे मलसमूह (पापराशि) दूर कर देती हैं। उनका जल इतना स्वच्छ है कि मणिके समान निर्मल दिखायी देता है। उनके तटवर्ती वनका भीतरी भाग मदमत्त दिग्गजों, जंगली हाथियों तथा देवराजकी सवारीमें आनेवाले श्रेष्ठ गजराजोंसे कोलाहलपूर्ण बना रहता है॥

वे फलों, फूलों, पल्लवों, गुल्मों तथा पक्षियोंसे आवृत्त होकर उत्तम आभूषणोंसे यत्नपूर्वक विभूषित हुई युवतीके समान शोभा पाती हैं। उनका प्राकट्य भगवान् विष्णुके चरणोंसे हुआ है। उनमें पापका लेश भी नहीं है। वे दिव्य नदी गङ्गा जीवोंके समस्त पापोंका नाश कर देनेवाली हैं॥ २३-२४॥

उनके जलमें सूँस, घड़ियाल और सर्प निवास करते हैं। सगरवंशी राजा भगीरथके तपोमय तेजसे जिनका शंकरजीके जटाजूटसे अवतरण हुआ था, जो समुद्रकी रानी हैं तथा जिनके निकट सारस और क्रौञ्च पक्षी कलरव करते रहते हैं, उन्हीं देवनदी गङ्गाके पास महाबाहु श्रीरामजी पहुँचे। गङ्गाकी वह धारा शृङ्गवेरपुरमें बह रही थी॥ २५-२६॥

जिनके आवर्त (भँवरें) लहरोंसे व्याप्त थे, उन गङ्गाजीका दर्शन करके महारथी श्रीरामने सारथि सुमन्त्रसे कहा— 'सूत! आज हमलोग यहीं रहेंगे'॥ २७॥

'सारथे! गङ्गाजीके समीप ही जो यह बहुत-से फूलों और नये-नये पल्लवोंसे सुशोभित महान् इङ्गुदीका वृक्ष है, इसीके नीचे आज रातमें हम निवास करेंगे'॥ २८॥

'जिनका जल देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, सर्पों, पशुओं तथा पक्षियोंके लिये भी समादरणीय है, उन कल्याणस्वरूपा, सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीका भी मुझे यहाँसे दर्शन होता रहेगा'॥ २९॥

तब लक्ष्मण और सुमन्त्र भी श्रीरामचन्द्रजीसे बहुत अच्छा कहकर अश्वोंद्वारा उस इंगुदी-वृक्षके समीप गये॥

उस रमणीय वृक्षके पास पहुँचकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ रथसे उतर गये॥ ३१॥