श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 644, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘राजासे रहित जनपदमें दूर जाकर व्यापार करनेवाले वणिक् बेचनेकी बहुत-सी वस्तुएँ साथ लेकर कुशलपूर्वक मार्ग तै नहीं कर सकते॥ २२ ॥
‘जहाँ कोई राजा नहीं होता, उस जनपदमें जहाँ संध्या हो वहीं डेरा डाल देनेवाला, अपने अन्तःकरणके द्वारा परमात्माका ध्यान करनेवाला और अकेला ही विचरनेवाला जितेन्द्रिय मुनि नहीं घूमता-फिरता है (क्योंकि उसे कोई भोजन देनेवाला नहीं होता)॥ २३ ॥
‘अराजक देशमें लोगोंको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति और प्राप्त वस्तुकी रक्षा नहीं हो पाती। राजाके न रहनेपर सेना भी युद्धमें शत्रुओंका सामना नहीं करती॥ २४ ॥
‘बिना राजाके राज्यमें लोग वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो हृष्ट-पुष्ट उत्तम घोड़ों तथा रथोंद्वारा सहसा यात्रा नहीं करते हैं (क्योंकि उन्हें लुटेरोंका भय बना रहता है)॥
‘राजासे रहित राज्यमें शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान् मनुष्य वनों और उपवनोंमें शास्त्रोंकी व्याख्या करते हुए नहीं ठहर पाते हैं॥ २६ ॥
‘जहाँ अराजकता फैल जाती है, उस जनपदमें मनको वशमें रखनेवाले लोग देवताओंकी पूजाके लिये फूल, मिठाई और दक्षिणाकी व्यवस्था नहीं करते हैं॥ २७ ॥
‘जिस जनपदमें कोई राजा नहीं होता है, वहाँ चन्दन और अगुरुका लेप लगाये हुए राजकुमार वसन्त-ऋतुके खिले हुए वृक्षोंकी भाँति शोभा नहीं पाते हैं॥ २८ ॥
‘जैसे जलके बिना नदियाँ, घासके बिना वन और ग्वालोंके बिना गौओंकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार राजाके बिना राज्य शोभा नहीं पाता है॥ २९ ॥
‘जैसे ध्वज रथका ज्ञान कराता है और धूम अग्निका बोधक होता है, उसी प्रकार राजकाज देखनेवाले हमलोगोंके अधिकारको प्रकाशित करनेवाले जो महाराज थे, वे यहाँसे देवलोकको चले गये॥ ३० ॥
‘राजाके न रहनेपर राज्यमें किसी भी मनुष्यकी कोई भी वस्तु अपनी नहीं रह जाती। जैसे मत्स्य एक-दूसरेको खा जाते हैं, उसी प्रकार अराजक देशके लोग सदा एक-दूसरेको खाते—लूटते-खसोटते रहते हैं॥ ३१ ॥
‘जो वेद-शास्त्रोंकी तथा अपनी-अपनी जातिके लिये नियत वर्णाश्रमकी मर्यादाको भङ्ग करनेवाले नास्तिक मनुष्य पहले राजदण्डसे पीड़ित होकर दबे रहते थे, वे भी अब राजाके न रहनेसे निःशङ्क होकर अपना प्रभुत्व प्रकट करेंगे॥ ३२ ॥