भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 650

‘स्वप्नमें ही मैंने यह भी देखा है कि समुद्र सूख गया, चन्द्रमा पृथ्वीपर गिर पड़े हैं, सारी पृथ्वी उपद्रवसे त्रस्त और अन्धकारसे आच्छादित-सी हो गयी है॥ ११ ॥

‘महाराजकी सवारीके काममें आनेवाले हाथीका दाँत टूक-टूक हो गया है और पहलेसे प्रज्वलित होती हुई आग सहसा बुझ गयी है॥ १२ ॥

‘मैंने यह भी देखा है कि पृथ्वी फट गयी है, नाना प्रकारके वृक्ष सूख गये हैं तथा पर्वत ढह गये हैं और उनसे धुआँ निकल रहा है॥ १३ ॥

‘काले लोहेकी चौकीपर महाराज दशरथ बैठे हैं। उन्होंने काला ही वस्त्र पहन रखा है और काले एवं पिङ्गलवर्णकी स्त्रियाँ उनके ऊपर प्रहार करती हैं॥ १४ ॥

‘धर्मात्मा राजा दशरथ लाल रंगके फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये गधे जुते हुए रथपर बैठकर बड़ी तेजीके साथ दक्षिण दिशाकी ओर गये हैं॥

‘लाल वस्त्र धारण करनेवाली एक स्त्री, जो विकराल मुखवाली राक्षसी प्रतीत होती थी, महाराजको हँसती हुई-सी खींचकर लिये जा रही थी। यह दृश्य भी मेरे देखनेमें आया॥ १६ ॥

‘इस प्रकार इस भयंकर रात्रिके समय मैंने यह स्वप्न देखा है। इसका फल यह होगा कि मैं, श्रीराम, राजा दशरथ अथवा लक्ष्मण—इनमेंसे किसी एककी अवश्य मृत्यु होगी॥ १७ ॥

‘जो मनुष्य स्वप्नमें गधे जुते हुए रथसे यात्रा करता दिखायी देता है, उसकी चिताका धुआँ शीघ्र ही देखनेमें आता है। यही कारण है कि मैं दुःखी हो रहा हूँ और आपलोगोंकी बातोंका आदर नहीं करता हूँ। मेरा गला सूखा-सा जा रहा है और मन अस्वस्थ-सा हो चला है॥

‘मैं भयका कोई कारण नहीं देखता तो भी भयको प्राप्त हो रहा हूँ। मेरा स्वर बदल गया है तथा मेरी कान्ति भी फीकी पड़ गयी है। मैं अपने-आपसे घृणा-सी करने लगा हूँ, परंतु इसका कारण क्या है, यह मेरी समझमें नहीं आता॥ २० ॥

‘जिनके विषयमें मैंने पहले कभी सोचातक नहीं था, ऐसे अनेक प्रकारके दुःस्वप्नोंको देखकर तथा महाराजका दर्शन इस रूपमें क्यों हुआ, जिसकी मेरे मनमें कोई कल्पना नहीं थी—यह सोचकर मेरे हृदयसे महान् भय दूर नहीं हो रहा है’॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६९॥