श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 668, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौहत्तरवाँ सर्ग
भरतका कैकेयीको कड़ी फटकार देना
इस प्रकार माताकी निन्दा करके भरत उस समय महान् रोषावेशसे भर गये और फिर कठोर वाणीमें कहने लगे—॥ १ ॥
‘दृष्टतापूर्ण बर्ताव करनेवाली क्रूरहृदया कैकेयि! तू राज्यसे भ्रष्ट हो जा। धर्मने तेरा परित्याग कर दिया है, अतः अब तू मरे हुए महाराजके लिये रोना मत, (क्योंकि तू पत्नीधर्मसे गिर चुकी है) अथवा मुझे मरा हुआ समझकर तू जन्मभर पुत्रके लिये रोया कर॥ २ ॥
‘श्रीरामने अथवा अत्यन्त धर्मात्मा महाराज (पिताजी) ने तेरा क्या बिगाड़ा था, जिससे एक साथ ही उन्हें तुम्हारे कारण वनवास और मृत्युका कष्ट भोगना पड़ा?॥ ३ ॥
कैकेयि! तूने इस कुलका विनाश करनेके कारण भ्रूणहत्याका पाप अपने सिरपर लिया है, इसलिये तू नरकमें जा और पिताजीका लोक तुझे न मिले॥ ४ ॥
‘तूने इस घोर कर्मके द्वारा समस्त लोकोंके प्रिय श्रीरामको देशनिकाला देकर जो ऐसा बड़ा पाप किया है, उसने मेरे लिये भी भय उपस्थित कर दिया है॥ ५ ॥
‘तेरे कारण मेरे पिताकी मृत्यु हुर्ई, श्रीरामको वनका आश्रय लेना पड़ा और मुझे भी तूने इस जीवजगतमें अपयशका भागी बना दिया॥ ६ ॥
‘राज्यके लोभमें पड़कर क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाली दुराचारिणी पतिघातिनि! तू माताके रूपमें मेरी शत्रु है। तुझे मुझसे बात नहीं करनी चाहिये॥ ७ ॥
‘कौसल्या, सुमित्रा तथा जो अन्य मेरी माताएँ हैं, वे सब तुझ कुलकलङ्किनीके कारण महान् दुःखमें पड़ गयी हैं॥ ८ ॥
‘तू बुद्धिमान् धर्मराज अश्वपतिकी कन्या नहीं है। तू उनके कुलमें कोर्इ राक्षसी पैदा हो गयी है, जो पिताके वंशका विध्वंस करनेवाली है॥ ९ ॥
‘तूने सदा सत्यमें तत्पर रहनेवाले धर्मात्मा वीर श्रीरामको जो वनमें भेज दिया और तेरे कारण जो मेरे पिता स्वर्गवासी हो गये, इन सब कुकृत्योंद्वारा तूने प्रधान रूपसे जिस पापका अर्जन किया है, वह पाप मुझमें आकर अपना फल दिखा रहा है; इसलिये मैं पितृहीन हो गया, अपने दो भाइयोंसे बिछुड़ गया और समस्त जगत्के लोगोंके लिये अप्रिय बन गया॥ १०-११ ॥