श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइक्यासीवाँ सर्ग
प्रातःकालके मङ्गलवाद्य-घोषको सुनकर भरतका दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजीका सभामें आकर मन्त्री आदिको बुलानेके लिये दूत भेजना
इधर अयोध्यामें उस अभ्युदयसूचक रात्रिका थोड़ा-सा ही भाग अवशिष्ट देख स्तुति-कलाके विशेषज्ञ सूत और मागधोंने मङ्गलमयी स्तुतियोंद्वारा भरतका स्तवन आरम्भ किया॥ १ ॥
प्रहरकी समाप्तिको सूचित करनेवाली दुन्दुभि सोनेके डंडेसे आहत होकर बज उठी। बाजे बजानेवालोंने शङ्ख तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकारके सैकड़ों बाजे बजाये॥ २ ॥
वाद्योंका वह महान् तुमुल घोष समस्त आकाशको व्याप्त करता हुआ-सा गूँज उठा और शोकसंतप्त भरतको पुनः शोकाग्निकी आँचसे राँधने लगा॥ ३ ॥
वाद्योंकी उस ध्वनिसे भरतकी नींद खुल गयी; वे जाग उठे और ‘मैं राजा नहीं हूँ’ ऐसा कहकर उन्होंने उन बाजोंका बजना बंद करा दिया। तत्पश्चात् वे शत्रुघ्नसे बोले— ‘शत्रुघ्न! देखो तो सही, कैकेयीने जगत्का कितना महान् अपकार किया है। महाराज दशरथ मुझपर बहुत-से दुःखोंका बोझ डालकर स्वर्गलोकको चले गये॥ ५ ॥
‘आज उन धर्मराज महामना नरेशकी यह धर्ममूला राजलक्ष्मी जलमें पड़ी हुई बिना नाविककी नौकाके समान इधर-उधर डगमगा रही है॥ ६ ॥
‘जो हमलोगोंके सबसे बड़े स्वामी और संरक्षक हैं, उन श्रीरघुनाथजीको भी स्वयं मेरी इस माताने धर्मको तिलाञ्जलि देकर वनमें भेज दिया’॥ ७ ॥
उस समय भरतको इस प्रकार अचेत हो-होकर विलाप करते देख रनिवासकी सारी स्त्रियाँ दीनभावसे फूट-फूटकर रोने लगीं॥ ८ ॥
जब भरत इस प्रकार विलाप कर रहे थे, उसी समय राजधर्मके ज्ञाता महायशस्वी महर्षि वसिष्ठने इक्ष्वाकुनाथ राजा दशरथके सभाभवनमें प्रवेश किया॥ ९ ॥
वह सभाभवन अधिकांश सुवर्णका बना हुआ था। उसमें सोनेके खम्भे लगे थे। वह रमणीय सभा देवताओंकी सुधर्मा सभाके समान शोभा पाती थी। सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता धर्मात्मा वसिष्ठने अपने शिष्यगणके साथ उस सभामें पदार्पण किया और सुवर्णमय पीठपर जो