भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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इक्यानबेवाँ सर्ग

भरद्वाज मुनिके द्वारा सेनासहित भरतका दिव्य सत्कार

जब भरतने उस आश्रममें ही निवासका दृढ़ निश्चय कर लिया, तब मुनिने कैकेयीकुमार भरतको अपना आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये न्यौता दिया॥ १ ॥

यह सुनकर भरतने उनसे कहा— 'मुने! वनमें जैसा आतिथ्य-सत्कार सम्भव है, वह तो आप पाद्य, अर्घ्य और फल-मूल आदि देकर कर ही चुके'॥ २ ॥

उनके ऐसा कहनेपर भरद्वाजजी भरतसे हँसते हुए-से बोले— 'भरत! मैं जानता हूँ, मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम है; अतः मैं तुम्हें जो कुछ दूँगा, उसीसे तुम संतुष्ट हो जाओगे॥ ३ ॥

'किंतु इस समय मैं तुम्हारी सेनाको भोजन कराना चाहता हूँ। नरश्रेष्ठ! इससे मुझे प्रसन्नता होगी और जिस तरह मुझे प्रसन्नता हो, वैसा कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिये॥ ४ ॥

'पुरुषप्रवर! तुम अपनी सेनाको किसलिये इतनी दूर छोड़कर यहाँ आये हो, सेनासहित यहाँ क्यों नहीं आये?'॥ ५ ॥

तब भरतने हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनिको उत्तर दिया— 'भगवन्! मैं आपके ही भयसे सेनाके साथ यहाँ नहीं आया॥ ६ ॥

'प्रभो! राजा और राजपुत्रको चाहिये कि वे सभी देशोंमें प्रयत्नपूर्वक तपस्वीजनोंको दूर छोड़कर रहें (क्योंकि उनके द्वारा उन्हें कष्ट पहुँचनेकी सम्भावना रहती है)॥

'भगवन्! मेरे साथ बहुत-से अच्छे-अच्छे घोड़े, मनुष्य और मतवाले गजराज हैं, जो बहुत बड़े भूभागको ढककर मेरे पीछे-पीछे चलते हैं॥ ८ ॥

'वे आश्रमके वृक्ष, जल, भूमि और पर्णशालाओंको हानि न पहुँचायें, इसलिये मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ'॥

तदनन्तर उन महर्षिने आज्ञा दी कि 'सेनाको यहीं ले आओ।' तब भरतने सेनाको वहीं बुलवा लिया॥ १० ॥

इसके बाद मुनिवर भरद्वाजने अग्निशालामें प्रवेश करके जलका आचमन किया और ओठ पोंछकर भरतके आतिथ्य-सत्कारके लिये विश्वकर्मा आदिका आवाहन किया॥ ११ ॥