भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 724, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 724

वह महल चौकोना तथा बहुत बड़ा था—उसमें संकीर्णताका अनुभव नहीं होता था। उसमें सोने, बैठने और सवारियोंके रहनेके लिये अलग-अलग स्थान थे। वहाँ सब प्रकारके दिव्य रस, दिव्य भोजन और दिव्य वस्त्र प्रस्तुत थे॥ ३४ ॥

सब तरहके अन्न और धुले हुए स्वच्छ पात्र रखे गये थे। उस सुन्दर भवनमें कहीं बैठनेके लिये सब प्रकारके आसन उपस्थित थे और कहीं सोनेके लिये सुन्दर शय्याएँ बिछी थीं॥ ३५ ॥

महर्षि भरद्वाजकी आज्ञासे कैकेयीपुत्र महाबाहु भरतने नाना प्रकारके रत्नोंसे भरे हुए उस महलमें प्रवेश किया। उनके साथ-साथ पुरोहित और मन्त्री भी उसमें गये। उस भवनका निर्माणकौशल देखकर उन सब लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३६-३७ ॥

उस भवनमें भरतने दिव्य राजसिंहासन, चँवर और छत्र भी देखे तथा वहाँ राजा श्रीरामकी भावना करके मन्त्रियोंके साथ उन समस्त राजभोग्य वस्तुओंकी प्रदक्षिणा की॥ ३८ ॥

सिंहासनपर श्रीरामचन्द्रजी महाराज विराजमान हैं, ऐसी धारणा बनाकर उन्होंने श्रीरामको प्रणाम किया और उस सिंहासनकी भी पूजा की। फिर अपने हाथमें चँवर ले, वे मन्त्रीके आसनपर जा बैठे॥ ३९ ॥

तत्पश्चात् पुरोहित और मन्त्री भी क्रमशः अपने योग्य आसनोंपर बैठे; फिर सेनापति और प्रशास्ता (छावनीकी रक्षा करनेवाले) भी बैठ गये॥ ४० ॥

तदनन्तर वहाँ दो ही घड़ीमें भरद्वाज मुनिकी आज्ञासे भरतकी सेवामें नदियाँ उपस्थित हुईं, जिनमें कीचके स्थानमें खीर भरी थी॥ ४१ ॥

उन नदियोंके दोनों तटोंपर ब्रह्मर्षि भरद्वाजकी कृपासे दिव्य एवं रमणीय भवन प्रकट हो गये थे, जो चूनेसे पुते हुए थे॥ ४२ ॥

उसी मुहूर्तमें ब्रह्माजीकी भेजी हुई दिव्य आभूषणोंसे विभूषित बीस हजार दिव्याङ्गनाएँ वहाँ आयीं॥ ४३ ॥

इसी तरह सुवर्ण, मणि, मुक्ता और मूँगोंके आभूषणोंसे सुशोभित, कुबेरकी भेजी हुई बीस हजार दिव्य महिलाएँ भी वहाँ उपस्थित हुईं, जिनका स्पर्श पाकर पुरुष उन्मादग्रस्त-सा दिखायी देता है॥ ४४ १/२ ॥

इनके सिवा नन्दनवनसे बीस हजार अप्सराएँ भी आयीं। नारद, तुम्बुरु और गोप अपनी कान्तिसे सूर्यके समान प्रकाशित होते थे। ये तीनों गन्धर्वराज भरतके सामने गीत गाने लगे॥

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