श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 727, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंवनके आस-पास जितने कुएँ थे, उन सबमें गाढ़ी स्वादिष्ट खीर भरी हुई थी। वहाँकी गौएँ कामधेनु (सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली) हो गयी थीं और उस दिव्य वनके वृक्ष मधुकी वर्षा करते थे॥ ६९ ॥
भरतकी सेनामें आये हुए निषाद आदि निम्नवर्गके लोगोंकी तृप्तिके लिये वहाँ मधुसे भरी हुई बावड़ियाँ प्रकट हो गयी थीं तथा उनके तटोंपर तपे हुए पिठर (कुण्ड) में पकाये गये मृग, मोर और मुर्गोंके स्वच्छ मांस भी ढेर-के-ढेर रख दिये गये थे॥ ७० ॥
वहाँ सहस्रों सोनेके अन्नपात्र, लाखों व्यञ्जनपात्र और लगभग एक अरब थालियाँ संगृहीत थीं॥ ७१ ॥
पिठर, छोटे-छोटे घड़े तथा मटके दहीसे भरे हुए थे और उनमें दहीको सुस्वादु बनानेवाले सोंठ आदि मसाले पड़े हुए थे। एक पहर पहलेके तैयार किये हुए केसरमिश्रित पीतवर्णवाले सुगन्धित तक्रके कई तालाब भरे हुए थे। जीरा आदि मिलाये हुए तक्र (रसाल), सफेद दही तथा दूधके भी कई कुण्ड पृथक्-पृथक् भरे हुए थे। शक्करोंके कई ढेर लगे थे॥ ७२-७३ ॥
स्नान करनेवाले मनुष्योंको नदीके घाटोंपर भिन्नभिन्न पात्रोंमें पीसे हुए आँवले, सुगन्धित चूर्ण तथा और भी नाना प्रकारके स्नानोपयोगी पदार्थ दिखायी देते थे॥ ७४ ॥
साथ ही ढेर-के-ढेर दाँतन, जो सफेद कूँरुचेवाले थे, वहाँ रखे हुए थे। सम्पुटोंमें घिसे हुए सफेद चन्दन विद्यमान थे। इन सब वस्तुओंको लोगोंने देखा॥ ७५ ॥
इतना ही नहीं, वहाँ बहुत-से स्वच्छ दर्पण, ढेर-के-ढेर वस्त्र और हजारों जोड़े खड़ाऊँ और जूते भी दिखायी देते थे॥ ७६ ॥
काजलोंसहित कजरौटे, कंघे, कूर्च (थकरी या ब्रश), छत्र, धनुष, मर्मस्थानोंकी रक्षा करनेवाले कवच आदि तथा विचित्र शय्या और आसन भी वहाँ दृष्टिगोचर होते थे॥ ७७ ॥
गधे, ऊँट, हाथी और घोड़ोंके पानी पीनेके लिये कई जलाशय भरे थे, जिनके घाट बड़े सुन्दर और सुखपूर्वक उतरनेयोग्य थे। उन जलाशयोंमें कमल और उत्पल शोभा पा रहे थे। उनका जल आकाशके समान स्वच्छ था तथा उनमें सुखपूर्वक तैरा जा सकता था॥
पशुओंके खानेके लिये वहाँ सब ओर नील वैदूर्यमणिके समान रंगवाली हरी एवं कोमल घासकी ढेरियाँ लगी थीं। उन सब लोगोंने वे सारी वस्तुएँ देखीं॥ ७९ ॥