श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमस्त वेदों और पुराणोंके द्वारा साक्षात्कार होता है (इस रामायणके अनुशीलनसे भी उसीकी प्राप्ति होती है)।। ३० ।।
विप्रवरो! कार्तिक, माघ और चैत्रमासके शुक्ल पक्षमें नौ दिनोंमें रामायणकी अमृतमयी कथाका श्रवण करना चाहिये॥
जो इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके मंगलमय चरित्रका श्रवण करता है, वह इस लोक और परलोकमें भी अपनी समस्त उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥
वह सब पापोंसे मुक्त हो अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ श्रीरामचन्द्रजीके उस परमधाममें चला जाता है, जहाँ जाकर मनुष्यको कभी शोक नहीं करना पड़ता है॥
चैत्र, माघ और कार्तिकके शुक्लपक्षमें परम पुण्यमय रामायण-कथाका नवाह-पारायण करना चाहिये तथा नौ दिनोंतक इसे प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये॥ ३४ ॥
रामायण आदिकाव्य है। यह स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला है, अतः सम्पूर्ण धर्मोंसे रहित घोर कलियुग आनेपर नौ दिनोंमें रामायणकी अमृतमयी कथाको श्रवण करना चाहिये॥ ३५ १/२ ॥
ब्राह्मणो! जो लोग भयंकर कलिकालमें श्रीराम-नामका आश्रय लेते हैं, वे ही कृतार्थ होते हैं। कलियुग उन्हें बाधा नहीं पहुँचाता॥ ३६ १/२ ॥
जिस घरमें प्रतिदिन रामायणकी कथा होती है, वह तीर्थरूप हो जाता है। वहाँ जानेसे दुष्टोंके पापोंका नाश होता है॥ ३७ १/२ ॥
तपोधनो! इस शरीरमें तभीतक पाप रहते हैं, जबतक मनुष्य श्रीरामायणकथाका भलीभाँति श्रवण नहीं करता॥
संसारमें श्रीरामायणकी कथा परम दुर्लभ ही है। जब करोड़ों जन्मोंके पुण्योंका उदय होता है, तभी उसकी प्राप्ति होती है॥ ३९ १/२ ॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कार्तिक, माघ और चैत्रके शुक्ल पक्षमें रामायणके श्रवणमात्रसे (राक्षसभावापन्न) सौदास भी शापमुक्त हो गये थे॥ ४० १/२ ॥
सौदासने महर्षि गौतमके शापसे राक्षस-शरीर प्राप्त किया था। वे रामायणके प्रभावसे ही पुनः उस शापसे छुटकारा पा सके थे ॥ ४१ १/२ ॥