भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 2621 में से

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सनत्कुमारजी! भगवान्‌की महिमाको जाननेके लिये कार्तिक, माघ और चैत्रके शुक्ल पक्षमें रामायणकी अमृतमयी कथाका नवाह श्रवण करना चाहिये॥ २३ १/२ ॥

ब्राह्मण सुदास गौतमके शापसे राक्षस-शरीरको प्राप्त हो गये थे; परंतु रामायणके प्रभावसे ही उन्हें उस शापसे छुटकारा मिला था॥ २४ १/२ ॥

सनत्कुमारने पूछा—मुनिश्रेष्ठ! सम्पूर्ण धर्मोंका फल देनेवाली रामायणकथाका किसने वर्णन किया है? सौदासको गौतमद्वारा कैसे शाप प्राप्त हुआ? फिर वे रामायणके प्रभावसे किस प्रकार शापमुक्त हुए थे॥

मुने! यदि आपका हमलोगोंपर अनुग्रह हो तो सब कुछ ठीक-ठीक बताइये। इन सारी बातोंसे हमें अवगत कराइये; क्योंकि भगवान्‌की कथा वक्ता और श्रोता दोनोंके पापोंका नाश करनेवाली है॥ २७ १/२ ॥

नारदजीने कहा—ब्रह्मन्! रामायणका प्रादुर्भाव महर्षि वाल्मीकिके मुखसे हुआ है। तुम उसीको श्रवण करो। रामायणकी अमृतमयी कथाका श्रवण नौ दिनोंमें करना चाहिये॥ २८ १/२ ॥

सत्ययुगमें एक ब्राह्मण थे, जिन्हें धर्म-कर्मका विशेष ज्ञान था। उनका नाम था सोमदत्त। वे सदा धर्मके पालनमें ही तत्पर रहते थे॥ २९ १/२ ॥

(वे ब्राह्मण सौदास नामसे भी विख्यात थे।) ब्राह्मणने ब्रह्मवादी गौतम मुनिसे गंगाजीके मनोरम तटपर सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश सुना था। गौतमने पुराणों और शास्त्रोंकी कथाओंद्वारा उन्हें तत्त्वका ज्ञान कराया था। सौदासने गौतमसे उनके बताये हुए सम्पूर्ण धर्मोंका श्रवण किया था॥ ३०-३१ १/२ ॥

एक दिनकी बात है, सौदास परमेश्वर शिवकी आराधनामें लगे हुए थे। उसी समय वहाँ उनके गुरु गौतमजी आ पहुँचे; परंतु सौदासने अपने निकट आये हुए गुरुको भी उठकर प्रणाम नहीं किया॥ ३२ १/२ ॥

परम बुद्धिमान् गौतम तेजकी निधि थे, वे शिष्यके बर्तावसे रुष्ट न होकर शान्त ही बने रहे। उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि मेरा शिष्य सौदास शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करता है॥ ३३ १/२ ॥

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