भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 825

‘तब वहाँ विश्वामित्रजी मेरे पितासे बोले—‘राजन्! ये दोनों रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथके पुत्र हैं और आपके उस दिव्य धनुषका दर्शन करना चाहते हैं। आप अपना वह देवप्रदत्त धनुष राजकुमार श्रीरामको दिखाइये’॥ ४६ ॥

‘विप्रवर विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर पिताजीने उस दिव्य धनुषको मँगवाया और राजकुमार श्रीरामको उसे दिखाया॥ ४७ ॥

‘महाबली और परम पराक्रमी श्रीरामने पलक मारते-मारते उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसे तुरंत कानतक खींचा॥ ४८ ॥

‘उनके वेगपूर्वक खींचते समय वह धनुष बीचसे ही टूट गया और उसके दो टुकड़े हो गये। उसके टूटते समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ मानो वहाँ वज्र टूट पड़ा हो॥ ४९ ॥

‘तब मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिताने जलका उत्तम पात्र लेकर श्रीरामके हाथमें मुझे दे देनेका उद्योग किया॥ ५० ॥

‘उस समय अपने पिता अयोध्यानरेश महाराज दशरथके अभिप्रायको जाने बिना श्रीरामने राजा जनकके देनेपर भी मुझे नहीं ग्रहण किया॥ ५१ ॥

‘तदनन्तर मेरे बूढ़े श्वशुर राजा दशरथकी अनुमति लेकर पिताजीने आत्मज्ञानी श्रीरामको मेरा दान कर दिया॥ ५२ ॥

‘तत्पश्चात् पिताजीने स्वयं ही मेरी छोटी बहिन सती साध्वी परम सुन्दरी ऊर्मिलाको लक्ष्मणकी पत्नीरूपसे उनके हाथमें दे दिया॥ ५३ ॥

‘इस प्रकार उस स्वयंवरमें पिताजीने श्रीरामके हाथमें मुझको सौंपा था। मैं धर्मके अनुसार अपने पति बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीराममें सदा अनुरक्त रहती हूँ’॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११८॥