श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 874, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ सर्ग
महर्षि अगस्त्यका श्रीरामके प्रति अपनी प्रसन्नता प्रकट करके सीताकी प्रशंसा करना, श्रीरामके पूछनेपर उन्हें पञ्चवटीमें आश्रम बनाकर रहनेका आदेश देना तथा श्रीराम आदिका प्रस्थान
‘श्रीराम! आपका कल्याण हो। मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ। लक्ष्मण! मैं तुमपर भी बहुत संतुष्ट हूँ। आप दोनों भाई मुझे प्रणाम करनेके लिये जो सीताके साथ यहाँतक आये, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ १॥
‘रास्ता चलनेके परिश्रमसे आपलोगोंको बहुत थकावट हुई है। इसके कारण जो कष्ट हुआ है, वह आप दोनोंको पीड़ा दे रहा होगा। मिथिलेशकुमारी जानकी भी अपनी थकावट दूर करनेके लिये अधिक उत्कण्ठित है, यह बात स्पष्ट ही जान पड़ती है॥ २॥
‘यह सुकुमारी है और इससे पहले इसे ऐसे दुःखोंका सामना नहीं करना पड़ा है। वनमें अनेक प्रकारके कष्ट होते हैं, फिर भी यह पतिप्रेमसे प्रेरित होकर यहाँ आयी है॥ ३॥
‘श्रीराम! जिस प्रकार सीताका यहाँ मन लगे— जैसे भी यह प्रसन्न रहे, वही कार्य आप करें। वनमें आपके साथ आकर इसने दुष्कर कार्य किया है॥ ४॥
‘रघुनन्दन! सृष्टिकालसे लेकर अबतक स्त्रियोंका प्रायः यही स्वभाव रहता आया है कि यदि पति सम अवस्थामें है अर्थात् धनधान्यसे सम्पन्न, स्वस्थ एवं सुखी है, तब तो वे उसमें अनुराग रखती हैं, परंतु यदि वह विषम अवस्थामें पड़ जाता है—दरिद्र एवं रोगी हो जाता है, तब उसे त्याग देती हैं॥ ५॥
‘स्त्रियाँ विद्युत्की चपलता, शस्त्रोंकी तीक्ष्णता तथा गरुड एवं वायुकी तीव्र गतिका अनुसरण करती हैं॥
‘आपकी यह धर्मपत्नी सीता इन सब दोषोंसे रहित है। स्पृहणीय एवं पतिव्रताओंमें उसी तरह अग्रगण्य है, जैसे देवियोंमें अरुन्धती॥ ७॥
‘शत्रुदमन श्रीराम! आजसे इस देशकी शोभा बढ़ गयी, जहाँ सुमित्राकुमार लक्ष्मण और विदेहनन्दिनी सीताके साथ आप निवास करेंगे’॥ ८॥