श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 892, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ सर्ग
श्रीरामके टाल देनेपर शूर्पणखाका लक्ष्मणसे प्रणययाचना करना, फिर उनके भी टालनेपर उसका सीतापर आक्रमण और लक्ष्मणका उसके नाक-कान काट लेना
श्रीरामने कामपाशसे बँधी हुई उस शूर्पणखासे अपनी इच्छाके अनुसार मधुर वाणीमें मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा— ॥ १ ॥
‘आदरणीया देवि! मैं विवाह कर चुका हूँ। यह मेरी प्यारी पत्नी विद्यमान है। तुम-जैसी स्त्रियोंके लिये तो सौतका रहना अत्यन्त दुःखदायी ही होगा॥ २ ॥
‘ये मेरे छोटे भाई श्रीमान् लक्ष्मण बड़े शीलवान्, देखनेमें प्रिय लगनेवाले और बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं। इनके साथ स्त्री नहीं है। ये अपूर्व गुणोंसे सम्पन्न हैं। ये तरुण तो हैं ही, इनका रूप भी देखनेमें बड़ा मनोरम है। अतः यदि इन्हें भार्याकी चाह होगी तो ये ही तुम्हारे इस सुन्दर रूपके योग्य पति होंगे॥ ३-४ ॥
‘विशाललोचने! वरारोहे! जैसे सूर्यकी प्रभा मेरुपर्र्वतका सेवन करती है, उसी प्रकार तुम मेरे इन छोटे भाई लक्ष्मणको पतिके रूपमें अपनाकर सौतके भयसे रहित हो इनकी सेवा करो’॥ ५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वह कामसे मोहित हुई राक्षसी उन्हें छोड़कर सहसा लक्ष्मणके पास जा पहुँची और इस प्रकार बोली— ॥ ६ ॥
‘लक्ष्मण! तुम्हारे इस सुन्दर रूपके योग्य मैं ही हूँ, अतः मैं ही तुम्हारी परम सुन्दरी भार्या हो सकती हूँ। मुझे अङ्गीकार कर लेनेपर तुम मेरे साथ समूचे दण्डकारण्यमें सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे’॥ ७ ॥
उस राक्षसीके ऐसा कहनेपर बातचीतमें निपुण सुमित्राकुमार लक्ष्मण मुसकराकर सूप-जैसे नखवाली उस निशाचरीसे यह युक्तियुक्त बात बोले— ॥ ८ ॥
‘लाल कमलके समान गौर वर्णवाली सुन्दरि! मैं तो दास हूँ, अपने बड़े भाई भगवान् श्रीरामके अधीन हूँ, तुम मेरी स्त्री होकर दासी बनना क्यों चाहती हो?॥ ९ ॥
‘विशाललोचने! मेरे बड़े भैया सम्पूर्ण ऐश्वर्यों (अथवा सभी अभीष्ट वस्तुओं) से सम्पन्न हैं। तुम उन्हींकी छोटी स्त्री हो जाओ। इससे तुम्हारे सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे और तुम सदा