श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 899, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्साहके साथ स्वभावतः लाल नेत्रोंवाले मधुरभाषी श्रीरामसे, जिनका पराक्रम वे देख चुके थे, यों बोले— ॥ ११-१२ ॥
‘अरे! तूने हमारे स्वामी महाकाय खरको क्रोध दिलाया है; अतः हमलोगोंके हाथसे युद्धमें मारा जाकर तू स्वयं ही तत्काल अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा॥ १३ ॥
‘हम बहुत-से हैं और तू अकेला, तेरी क्या शक्ति है कि तू हमारे सामने रणभूमिमें खड़ा भी रह सके, फिर युद्ध करना तो दूरकी बात है॥ १४ ॥
‘हमारी भुजाओंद्वारा छोड़े गये इन परिघों, शूलों और पट्टिशोंकी मार खाकर तू अपने हाथमें दबाये हुए इस धनुषको, बल-पराक्रमके अभिमानको तथा अपने प्राणोंको भी एक साथ ही त्याग देगा’॥ १५ ॥
ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए वे चौदहों राक्षस तरह-तरहके आयुध और तलवारें लिये श्रीरामपर ही टूट पड़े॥ १६ ॥
उन राक्षसोंने दुर्जय वीर श्रीराघवेन्द्रपर वे शूल चलाये, परंतु ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजीने उन समस्त चौदहों शूलोंको उतने ही सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा काट डाला॥ १७ १/२ ॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी रघुनाथजीने अत्यन्त कुपित हो शानपर चढ़ाकर तेज किये गये सूर्यतुल्य तेजस्वी चौदह नाराच हाथमें लिये। फिर धनुष लेकर उसपर उन बाणोंको रखा और कानतक खींचकर राक्षसोंको लक्ष्य करके छोड़ दिया। मानो इन्द्रने वज्रोंका प्रहार किया हो॥ १८-१९ १/२ ॥
वे बाण बड़े वेगसे उन राक्षसोंकी छाती छेदकर रुधिरमें डूबे हुए निकले और बाँबीसे बाहर आये हुए सर्पोंकी भाँति तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २० १/२ ॥
उन नाराचोंसे हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण वे राक्षस जड़से कटे हुए वृक्षोंकी भाँति धराशायी हो गये। वे सब-के-सब खूनसे नहा गये थे। उनके शरीर विकृत हो गये थे। उस अवस्थामें उनके प्राणपखेरू उड़ गये॥ २१ १/२ ॥
उन सबको पृथ्वीपर पड़ा देख वह राक्षसी क्रोधसे मूर्च्छित हो गयी और खरके पास जाकर पुनः आर्तभावसे गिर पड़ी। उसके कटे हुए कानों और नाकोंका खून सूख गया था, इसलिये गोंदयुक्त लताके समान प्रतीत होती थी॥ २२-२३ ॥