भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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भी परम प्रमाण माना है। त्रिजटाके स्वप्न, श्रीरामका यात्राकालिक मुहूर्तविचार, विभीषणद्वारा लंकाके अपशकुनोंका प्रतिपादन (लंकाकाण्ड १०वाँ सर्ग) आदि ज्योतिर्विज्ञानके ज्ञापक तथा समर्थक हैं। श्रीराम जब अयोध्यासे चलते हैं तो नौ ग्रह एकत्र हो जाते हैं⁷—इससे लंकायुद्ध होता है। दशरथजी श्रीरामसे ज्योतिषियोंद्वारा अपने अनिष्ट फलादेशकी बात बतलाते हैं। (अयोध्या० ४ । १८)⁸। युद्धकाण्ड १०२ । ३२–३४ के श्लोकोंमें रावणमरणके समयकी ग्रहस्थिति भी ध्येय है। युद्धकाण्ड ९१वें सर्गमें आयुर्वेदविज्ञानकी बातें हैं। युद्ध १८ वें सर्ग तथा ६३ । २ से २५ श्लोकतक राजनीतिकी अत्यन्त सारभूत अद्भुत बातें हैं। युद्धकाण्ड ७३ । २४–२८ में तन्त्रशास्त्रकी भी प्रक्रियाएँ हैं। इसमें रावण तथा मेघनादको भारी तान्त्रिक दिखलाया गया है। मेघनादकी सब विजय तन्त्रमूलक है। जब वह जीवित कृष्णछागकी बलि देता है, तब तप्तकाञ्चनके तुल्य अग्निकी दक्षिणावर्त शिखाएँ उसे विजय सूचित करती हैं— ‘प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तकाञ्चनसन्निभः।’ (६ । ७३। २३)। रावण भी भारी तान्त्रिक है। उसकी ध्वजापर (तान्त्रिकका चिह्न) नरशिरकपाल—मनुष्यकी खोपड़ीका चिह्न था। (६ । १०० । १४)। किंतु उसके पराभव आदिद्वारा ऋषि वाममार्गके इन बलि-मांस-सुरादि क्रियाओंकी असमीचीनता प्रदर्शित करते हैं (गोस्वामी तुलसीदासजीने भी ‘तजि श्रुति पंथ बाम मग चलहीं,’ (अयोध्या० १६८। ७-८), ‘कौल कामबस कृपन बिमूढा’ (लंका० ३१ । २) आदिसे इसी बातका समर्थन किया है)। इस तरह हमें महर्षिकी दृष्टिमें ज्योतिष, तन्त्र, आयुर्वेद, शकुन आदि शास्त्रोंकी प्राचीनता एवं समीचीनता ज्ञात होती है। वस्तुतः यही परम आस्तिककी दृष्टि होती है। धर्मशास्त्रके लिये तो यह ग्रन्थ परम प्रमाण है ही, अन्य ऐतिहासिक कथाएँ भी बहुत हैं, अर्थशास्त्रकी भी पर्याप्त सामग्री है। व्यवहार तथा आचारकी भी बातें हैं, कुशलमार्गका भी प्रदर्शन है।

पवित्र दार्शनिकता

महर्षि वाल्मीकिकी अद्भुत कविता एवं अन्यान्य महत्तामें उनकी तपस्या ही हेतु है। इसमें वाल्मीकिरामायण ही साक्षी है। ‘तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदांवरम्’ से इस काव्यका ‘तप’ शब्दसे ही आरम्भ होता है और प्रथम अर्धालीमें ही दो बार ‘तप’ शब्द आया और ‘तपस्वी’ शब्दद्वारा महर्षिने एक प्रकारसे अपनी जीवनी भी लिख दी। तपद्वारा ही ब्रह्माजीका उन्होंने साक्षात् किया, रामायणकी दिव्यकाव्यताका आशीर्वाद लिया और रामचरित्रका दर्शन किया। बादमें विश्वामित्रके विचित्र तपका वर्णन, गङ्गाजीके आगमनमें भगीरथकी अद्भुत तपस्या, चूली ऋषिकी तपस्या, भृगुकी तपस्या आदिका भी वर्णन है। इनके मतसे स्वर्गादि सभी