भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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तेँऽइसवाँ सर्ग

भयंकर उत्पातोंको देखकर भी खरका उनकी परवा नहीं करना तथा राक्षस-सेनाका श्रीरामके आश्रमके समीप पहुँचना

उस सेनाके प्रस्थान करते समय आकाशमें गधेके समान धूसर रंगवाले बादलोंकी महाभयंकर घटा घिर आयी। उसकी तुमुल गर्जना होने लगी तथा सैनिकोंके ऊपर घोर अमङ्गलसूचक रक्तमय जलकी वर्षा आरम्भ हो गयी॥ १ ॥

खरके रथमें जुते हुए महान् वेगशाली घोड़े फूल बिछे हुए समतल स्थानमें सड़कपर चलते-चलते अकस्मात् गिर पड़े॥ २ ॥

सूर्यमण्डलके चारों ओर अलातचक्रके समान गोलाकार घेरा दिखायी देने लगा, जिसका रंग काला और किनारेका रंग लाल था॥ ३ ॥

तदनन्तर खरके रथकी सुवर्णमय दण्डवाली ऊँची ध्वजापर एक विशालकाय गीध आकर बैठ गया, जो देखनेमें बड़ा ही भयंकर था॥ ४ ॥

कठोर स्वरवाले मांसभक्षी पशु और पक्षी जनस्थानके पास आकर विकृत स्वरमें अनेक प्रकारके विकट शब्द बोलने लगे तथा सूर्यकी प्रभासे प्रकाशित हुँऽइ दिशाओंमें जोर-जोरसे चीत्कार करनेवाले और मुँहसे आग उगलनेवाले भयंकर गीदड़ राक्षसोंके लिये अमङ्गलजनक भैरवनाद करने लगे॥ ५-६ ॥

भयंकर मेघ, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके समान दिखायी देते थे और जलकी जगह रक्त धारण किये हुए थे, तत्काल घिर आये। उन्होंने समूचे आकाशको ढक दिया। थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं रहने दिया॥ ७ ॥

सब ओर अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी घना अन्धकार छा गया। दिशाओं अथवा कोणोंका स्पष्टरूपसे भान नहीं हो पाता था॥ ८ ॥

बिना समयके ही खूनसे भीगे हुए वस्त्रके समान रंगवाली संध्या प्रकट हो गयी। उस समय भयंकर पशु-पक्षी खरके सामने आकर गर्जना करने लगे॥ ९ ॥

भयकी सूचना देनेवाले कङ्क (सफेद चील), गीदड़ और गीध खरके सामने चीत्कार करने लगे। युद्धमें सदा अमङ्गल सूचित करनेवाली और भय दिखानेवाली गीदड़ियाँ खरकी सेनाके