श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअकम्पनकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावणने नागराज (महान् सर्प) की भाँति लम्बी साँस खींचकर इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥
अकम्पन! बताओ तो सही क्या राम सम्पूर्ण देवताओं तथा देवराज इन्द्रके साथ जनस्थानमें आये हैं?'॥ १३ ॥
रावणका यह प्रश्न सुनकर अकम्पनने महात्मा श्रीरामके बल और पराक्रमका पुनः इस प्रकार वर्णन किया— 'लङ्केश्वर! जिनका नाम राम है, वे संसारके समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं। दिव्यास्त्रोंके प्रयोगका जो गुण है, उससे भी वे पूर्णतः सम्पन्न हैं। युद्धकी कलामें तो वे पराकाष्ठाको पहुँचे हुए हैं॥ १५ ॥
'श्रीरामके साथ उनके छोटे भार्इ लक्ष्मण भी हैं, जो उन्हींके समान बलवान् हैं। उनका मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर है। उनकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं और स्वर दुन्दुभिके समान गम्भीर है॥ १६ ॥
'जैसे अग्निके साथ वायु हों, उसी प्रकार अपने भार्इके साथ संयुक्त हुए राजाधिराज श्रीमान् राम बड़े प्रबल हैं। उन्होंने ही जनस्थानको उजाड़ डाला है॥ १७ ॥
'उनके साथ न कोर्इ देवता हैं, न महात्मा मुनि। इस विषयमें आप कोर्इ विचार न करें। श्रीरामके छोड़े हुए सोनेकी पाँखोंवाले बाण पाँच मुखवाले सर्प बनकर राक्षसोंको खा जाते थे॥ १८ १/२ ॥
'भयसे कातर हुए राक्षस जिस-जिस मार्गसे भागते थे, वहाँ-वहाँ वे श्रीरामको ही अपने सामने खड़ा देखते थे। अनघ! इस प्रकार अकेले श्रीरामने ही आपके जनस्थानका विनाश किया है'॥ १९-२० ॥
अकम्पनकी यह बात सुनकर रावणने कहा— 'मैं अभी लक्ष्मणसहित रामका वध करनेके लिये जनस्थानको जाऊँगा'॥ २१ ॥
उसके ऐसा कहनेपर अकम्पन बोला— 'राजन्! श्रीरामका बल और पुरुषार्थ जैसा है, उसका यथावत् वर्णन मुझसे सुनिये॥ २२ ॥
'महायशस्वी श्रीराम यदि कुपित हो जायँ तो उन्हें अपने पराक्रमके द्वारा कोर्इ भी काबूमें नहीं कर सकता। वे अपने बाणोंसे भरी हुर्इ नदीके वेगको भी पलट सकते हैं तथा तारा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित सम्पूर्ण आकाशमण्डलको पीड़ा दे सकते हैं॥ २३ १/२ ॥