श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 944, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ निशाचरपते! जिन नरेशोंके गुप्तचर, कोष और नीति—ये सब अपने अधीन नहीं हैं, वे साधारण लोगोंके ही समान हैं॥ ९॥
‘गुप्तचरोंकी सहायतासे राजालोग दूर-दूरके सारे कार्योंकी देखभाल करते रहते हैं, इसीलिये वे दीर्घदर्शी या दूरदर्शी कहलाते हैं॥ १०॥
‘मैं समझती हूँ, तुम गवाँर मन्त्रियोंसे घिरे हुए हो, तभी तो तुमने अपने राज्यके भीतर गुप्तचर नहीं तैनात किये हैं। तुम्हारे स्वजन मारे गये और जनस्थान उजाड़ हो गया, फिर भी तुम्हें इसका पता नहीं लगा है॥ ११॥
‘अकेले रामने, जो अनायास ही महान् कर्म करनेवाले हैं, भीमकर्मा राक्षसोंकी चौदह हजार सेनाको यमलोक पहुँचा दिया, खर और दूषणके भी प्राण ले लिये, ऋषियोंको भी अभयदान कर दिया तथा दण्डकारण्यमें राक्षसोंकी ओरसे जो विघ्न-बाधाएँ थीं, उन सबको दूर करके वहाँ शान्ति स्थापित कर दी। जनस्थानको तो उन्होंने चौपट ही कर डाला॥ १२-१३॥
‘राक्षस! तुम तो लोभ और प्रमादमें फँसकर पराधीन हो रहे हो, अतः अपने ही राज्यमें उत्पन्न हुए भयका तुम्हें कुछ पता ही नहीं है॥ १४॥
‘जो राजा कठोरतापूर्ण बर्ताव करता अथवा तीखे स्वभावका परिचय देता है, सेवकोंको बहुत कम वेतन देता है, प्रमादमें पड़ा और गर्वमें भरा रहता है तथा स्वभावसे ही शठ होता है, उसके संकटमें पड़नेपर सभी प्राणी उसका साथ छोड़ देते हैं—उसकी सहायताके लिये आगे नहीं बढ़ते हैं॥ १५॥
‘जो अत्यन्त अभिमानी, अपनानेके अयोग्य, आप ही अपनेको बहुत बड़ा माननेवाला और क्रोधी होता है, ऐसे नर अथवा नरेशको संकटकालमें आत्मीय जन भी मार डालते हैं॥ १६॥
‘जो राजा अपने कर्तव्यका पालन अथवा करनेयोग्य कार्योंका सम्पादन नहीं करता तथा भयके अवसरोंपर भयभीत (एवं अपनी रक्षाके लिये सावधान) नहीं होता, वह शीघ्र ही राज्यसे भ्रष्ट एवं दीन होकर इस भूतलपर तिनकोंके समान उपेक्षणीय हो जाता है॥ १७॥
‘लोगोंको सूखे काठोंसे, मिट्टीके ढेलों तथा धूलसे भी कुछ प्रयोजन होता है, किंतु स्थानभ्रष्ट राजाओंसे उन्हें कोई प्रयोजन नहीं रहता॥ १८॥
‘जैसे पहना हुआ वस्त्र और मसल डाली गयी फूलोंकी माला दूसरोंके उपयोगमें आनेयोग्य नहीं होती, इसी प्रकार राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा समर्थ होनेपर भी दूसरोंके लिये निरर्थक है॥ १९॥