भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 969, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 969

⬅ विषय-सूची (TOC)

इकतालीसवाँ सर्ग

मारीचका रावणको विनाशका भय दिखाकर पुनः समझाना

रावणने जब राजाकी भाँति उसे ऐसी प्रतिकूल आज्ञा दी, तब मारीचने निःशङ्क होकर उस राक्षसराजसे कठोर वाणीमें कहा— ॥ १ ॥

‘निशाचर! किस पापीने तुम्हें पुत्र, राज्य और मन्त्रियोंसहित तुम्हारे विनाशका यह मार्ग बताया है?॥

‘राजन्! कौन ऐसा पापाचारी है, जो तुम्हें सुखी देखकर प्रसन्न नहीं हो रहा है? किसने युक्तिसे तुम्हें मौतके द्वारपर जानेकी यह सलाह दी है?॥ ३ ॥

‘निशाचर! आज यह बात स्पष्टरूपसे ज्ञात हो गयी कि तुम्हारे दुर्बल शत्रु तुम्हें किसी बलवान्से भिड़ाकर नष्ट होते देखना चाहते हैं॥ ४ ॥

‘राक्षसराज! तुम्हारे अहितका विचार रखनेवाले किस नीचने तुम्हें यह पाप करनेका उपदेश दिया है? जान पड़ता है कि वह तुम्हें अपने ही कुकर्मसे नष्ट होते देखना चाहता है॥ ५ ॥

‘रावण! निश्चय ही वधके योग्य तुम्हारे वे मन्त्री हैं, जो कुमार्गपर आरूढ़ हुए तुम-जैसे राजाको सब प्रकारसे रोक नहीं रहे हैं; किंतु तुम उनका वध नहीं करते हो॥

‘अच्छे मन्त्रियोंको चाहिये कि जो राजा स्वेच्छाचारी होकर कुमार्गपर चलने लगे, उसे सब प्रकारसे वे रोकें। तुम भी रोकनेके ही योग्य हो; फिर भी वे मन्त्री तुम्हें रोक नहीं रहे हैं॥ ७ ॥

‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ निशाचर! मन्त्री अपने स्वामी राजाकी कृपासे ही धर्म, अर्थ, काम और यश पाते हैं॥ ८ ॥

‘रावण! यदि स्वामीकी कृपा न हो तो सब व्यर्थ हो जाता है। राजाके दोषसे दूसरे लोगोंको भी कष्ट भोगना पड़ता है॥ ९ ॥

‘विजयशीलोंमें श्रेष्ठ राक्षसराज! धर्म और यशकी प्राप्तिका मूल कारण राजा ही है; अतः सभी अवस्थाओंमें राजाकी रक्षा करनी चाहिये॥ १० ॥

‘रात्रिमें विचरनेवाले राक्षस! जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा हो, जो जनताके अत्यन्त प्रतिकूल चलनेवाला और उद्दण्ड हो, ऐसे राजासे राज्यकी रक्षा नहीं हो सकती॥ ११ ॥