भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पर उनके पति, कामशास्त्रके पण्डित न होनेकी वजहसे, उनको नहीं पहचानते, उन्हें अपनेसे विरक्ता और परपुरुषरता नहीं समझते। इसलिये, जब वे उन्हें चूमते हैं, तब वे मन न होने पर भी ईकार तो नहीं करतीं; पर तुरन्त ही गालको पोंछ डालती हैं*। इस तरह पुरुष और स्त्री किसी को भी चुम्बनका आनन्द नहीं आता। महाकवि अकबर कहते हैं:—

खैर, चुप रहिये, मजा ही न मिला बोसेका।

मैं भी वै-लुत्फ़ दुबा, आपके भुंभलानेसे॥

आपके भुंभलानेसे, आपके बेमन होनेसे, चुम्बनका मजा मुझे

*नामि पश्यति भतोरं नोत्तरंसम्प्रतीच्छति।

वियोगे सुखमाप्नोति संयोगे चाति सीदति॥

शय्यासुपगता शेतै वदनमाष्टिं चुम्बने।

तन्निमंत्र द्वेष्टि मानञ्च विरक्तानामिवांछति॥

जो स्त्री अपने पतिके सामने नहीं देखती, उससे आँखें नहीं मिलाती, उसकी पछी हुई बातका जवाब नहीं देती, पति जबतक घरमें रहता है दुखी रहतो और सुनभुनातो फिरती है, जब पति घरसे बाहर चला जाता है, तब खुश होकर उड़लती-कूदती फिरती है; अग्वल तो पतिके साथ एक पलंग पर नहीं सोती, अगर मजबूरीसे सो भी जाती है, तो करवट ले जाती है और पतिके चूमने पर गालको पोंछ डालती है, पतिके मित्रसे दूब रखती है और पतिके दिलसे चाहने पर भी उससे नाराज़ हो रहती है—उसे “पतिद्रुक या पतिद्रुह” कहते हैं। ये पतिको न चाहनेवालो—उससे वैर-विरोध रखनेवाली स्थित्योके लज्ज्य हैं।