शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 544 में से
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मणिप्रकाराः सरसञ्च चन्दनं शुचौ प्रिये, यान्तिजनस्य सेव्यताम् ॥६॥
( ३ )
पयोधराश्चन्दनपंकशीतला— स्तुधारगोरापितहारशेखराः । नितम्बदेशाश्च सहेम मेखलाः प्रकुर्वन्ते कस्य मनो न सोत्सुकम् ॥१०॥
इस श्रीयम् ऋतुमें, चन्दनके पानीसे भिगोये हुए पट्टे की हवा से, हारयुक्त स्तनमण्डलोंको छातीसे लगानेसे और बीणाके मधुर स्वरके साथ गाना सुननेसे सोया हुआ कामदेव भी चैतन्य हो जाता है ॥१॥
हे प्यारी ! इस आषाढ़के महीनेमें कहीं रात और चन्द्रमा ; कहीं थोड़े जलवाला तालाब और कहीं फुहारिदार घर ; कहीं नाना प्रकारके शीतल रत्न और कहीं सरस चन्दन—मनुष्योंके सेवनीय हो जाते हैं ॥२॥
इस ऋतुमें, बर्फके समान सफेद और उज्ज्वल हार धारण किये चन्दन-वर्चिंत शीतल पयोधर * और सोने की कौंधनी पड़े हुए नितम्ब † जिसके चित्तको उत्कण्ठित नहीं करते ? ॥३॥
- पयोधर = स्तन, वर्चिंता ।
† नितम्ब = कमर का पिछला भाग, चतङ्ग ।