भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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सार—प्रेम—कुलीनता, विवेक और पाण्डित्य प्रभृति सद्गुणोंका शत्रु है ।

61. Respectibility, wisdom, good sense and family distinction find place in a man only so long as the fire of passion has not begun to burn in him.

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शास्त्रज्ञोऽपि प्रथितविनयोऽप्यात्मबोधोऽपि बाधं

संसारेऽस्मिन् भवति विरलो भाननं सद्दीनाम् ॥

येनेतस्मिन्नेत्यनगरद्वारमुद्घाटयन्ती

वामाचीणां भवति कुटिलश्रूलता कुञ्चिकेव ॥६२॥

शास्त्रज्ञ, विनयी और आत्मज्ञानियोंमें कोई विरला ही ऐसा होगा, जो सद्गतिका पात्र हो ; क्योंकि यहाँ वामलोचना स्त्रियोंकी बाँकी श्रू-लता-रूपी कुञ्जी उनके लिए नरकद्वारका ताला खोले रहती है ॥६२॥

खुलासा—शास्त्रज्ञ और ब्रह्मज्ञानियोंकी सद्गति तो तभी हो सकती है, जब कि वे कामिनीकी बाँकी भाँहोंकी भूपटमें आनेसे बचें । उनकी कमानसी भाँहोंको देखकर बड़े-बड़े वेदान्तियोंकी अङ्क मारी जाती है । वह हज़ार गीता, भागवत और उपनिषदोंका पाठ करें, हज़ार योगवासिष्ठोंका परीक्षण करें ; पर उनके चित्त पर चढ़ी कामिनीका उत्तरण बहुत कठिन

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