भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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blissful region of the Himalayas in whose caves pious men reside and where the bull of God Shiva rubs his shoulder against the trees and where the mountain slabs are washed by the water of the Ganges.

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संसार तव निस्तारपदवी न दीयीसी ।

अन्तरा दुस्तरा न सूर्यदिरे मदिरेचाणाः । १३ ॥

हे संसार ! यदि तुममें मदसे मतवाले नेत्रोंवाली दुस्तरा स्त्रियाँ न होतीं, तो तेरे परली पार जाना कुछ कठिन न होता ॥१३॥

खुलासा—मनुष्य इस लोकमें, कर्म-बन्धन या जन्म-मरणकी फाँसीसे पीछा छुड़ानेकी लिय आता है। मोक्षकी साधना के लिये ही, उसे मनुष्य-देहरूपी पारसमणि मिलती है कि, वह नियत अवधि के भीतर, उससे मोक्षरूपी सोना बना ले। पर, यहाँ आने पर, उसका वचपन तो खेल-कूद और पढ़ने-लिखनेमें कट जाता है। यौवनावस्था आने पर वह चञ्चलनयनी, उन्नत-नितम्बिनी, पीनपयोधरा कामिनियों के रूप-जालमें फँस जाता है। इनमें वह ऐसा भूलता है, कि उसकी सारी उग्र बीत जाती है और उसे अपने कर्त्तव्य-कर्मकी याद तक नहीं आती। इतने में ही उसकी अवधि पूरी हो जाती है और उससे पारसमणि रूपी मनुष्य-देह छिन जाती है ; यहाँसे वह मोक्षरूपी सोना बनाये बिना ही,