शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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मैं अपनी सखियोंमेंसे : किसी एकसे यह काम क्यों न लूँ ?” यह विचार खिर करके, उसने अपनी एक बहुत ही सुँह-लगी सखीको पास बुलाकर, उँगलीसे उस नौजवानको दिखाते हुए कहा— “प्यारी सखी ! तू उस छैल-छबीले-रसीले युवकको मेरे पास बुला ला । मेरी कामाग्नि इस समय बड़े जोरोंसे प्रज्वलित हो रही है । अगर वह बाँका छेला न आयेगा, तो मैं प्रचण्ड विरहा-नलमें भस्म हो जाऊँगी ।” कामविकार हलाहल विषकी तरह प्रचण्ड होता है । उसे कोई विरली ही कामिनी रोकनेमें समर्थ होती है । उस नीच सखीने, अपनी सखीकी पेशी भयानक पाप-पूर्ण बात सुनकर, उसे जघन्य कर्मसे रोका तो नहीं—फोरन ही नीचे उतरी और उसे बुलाकर महलमें ले आई ।
उस पुरुषने कन्दर्पकलाकी बातें सुनकर, उसकी कामशान्ति की ; पर चलते समय कहता गया, “प्यारी ! इसमें शक नहीं कि, तू अप्सराओंको भी लजानेवाली अनित्य सुन्दरी है । तेरे एक दिन भी न मिलनेसे मेरा जीवन न रहेगा ; लेकिन मैं तेरे इस महलमें आजके बाद कभी न आऊँगा । मैं नगरसे बाहर अमुक
दासी, रगड़ी, मटनी, विषवा, लड़की, दाई, कन्या, संन्यासिनी, भिक्षारिनि, सम्बन्धिनि, कारीगरनी, मालिन, सखी, पड़ोसन, नाहन, धोवन, और दहीछाछ वेचने वाली गुजरी औरःस्त्रियाँ —स्त्रियोंको बिगाड़ने और लजानेका काम करतीहैं । ये पुरुषोंका सन्देशा औरतोंके पास और औरतोंका सदाके पास पहुँचाती हैं । इनके द्वारा श्रच्छे-श्रच्छे वरों की स्त्रियाँ झराब हो जाती हैं ।