भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 526

हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता । २५

समय, इसकी भी एक मात्रा चाटी जाय, तब तो सोनेमें सुगन्ध हो जाय । मूल्य आध पाव घी का २॥

मृगनाभ्यादि वटी ।

कैसी ही धातु कम होगई हो या सूख गई हो, धातु की कमीसे खी-इच्छा न होती हो, अथवा वीर्य की कमीसे नामदीं होगई हो—इन गोळियोंसे अवश्य मरी हुई धातु भी जी उठेगी । अगर जाड़ेमें ये गोळियाँ कम-से-कम १६० भी सेवन कर ली जायँ, तो हम छाती ठोक कर कहते हैं, कि बहुत ही कम प्रसंग की इच्छा होनेवाले को भी प्रबल इच्छा होने लगेगी । आजमूदा दवा है । मूल्य ८० गोली का १०)

नपुंसक सज्जीवन वटी

ये गोळियाँ जैसा इन का नाम है वैसी ही हैं । नामदेके लिए जिन्दा करनेवाली हैं । इनके जाड़ेमें ३४ महीने लगा-तार खानेसे बेतहाशा प्रसंगेच्छा होती है । शामको दो या चार गोळियाँ खाठेनेसे अपूर्ण स्वर्गीय आनन्द आता है और प्रसंगमें डबल स्तम्भन होता है । शरीरमें कुर्ती और दूनी ताकत मल्लूम होती है । ये गोळियाँ कभी फेल नहीं होतीं । जिन्हें कोई रोग नहीं है, उन्हें भी जाड़ेमें ये गोळियाँ खानो चाहियँ । उप-रोक्त रोग नाश करनेके सिवा, ये गोळियाँ प्रमेह, शरीर का दर्द, जकड़न, गठिया, लकवा, बहुमूत्र, खाँसो और श्वासमें भी खूब लाभ दिखाती हैं । जिन लोगोंको प्रमेह, बहुमूत्र, खाँसो, श्वास

शृंगार शतक · पृष्ठ 526, कुल 544 में से · BharatKosha