शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः २७
पर दया तथा मैत्री का भाव रखना एवं उन्हें अभीष्ट दान देना तथा प्रिय वचन बोलना है, इनसे मनुष्य वशीभूत हो जाता है।
श्रुतिरास्तिक्यपूतात्मा पूजयेद्देवतां सदा।
देवतावद् गुरुजनमात्मवच्च सुहृज्जनम् ॥ १७२ ॥
आस्तिकता से पवित्र चित्त होकर सदा देवता की पूजा करै और देवता की भांति गुरुजनों की एवं अपने समान सुहृज्जनों का संमान करै ॥
प्रणिपातेन हि गुरून् सतोऽनूचानचेष्टितैः।
कुर्वीताभिमुखान्देवान् भृत्यै सुकृतकर्मणाम् ॥ १७३ ॥
साङ्ग-वेदज्ञ ब्राह्मणों से युक्त होकर राजा प्रणाम के द्वारा गुरुजनों तथा सज्जनों एवं देवताओं को अपने अनुकूल करै। इससे पुण्य की वृद्धि होती है और उससे वह सुखी होता है।
सद्भावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन च बांधवान्।
स्त्रीभृत्यो प्रेममानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम् ॥ १७४ ॥
सद्भाव से मित्र तथा बान्धवों के, प्रेम तथा मान (सत्कार) से स्त्री और भृत्य के एवं मनके अनुकूल कार्य करने से मूर्ख के चित्त को अपने वशीभूत करे।
बलवान्बुद्धिमाञ्शूरो यो हि युक्तपराक्रमो।
वित्तपूर्णां महीं भुंक्ते स भूयो भूपतिर्भवेत् ॥ १७५ ॥
जो राजा बलवान, बुद्धिमान, शूर तथा उचित समय पर पराक्रम करने-वाला होता है, वह धन से पूर्ण पृथ्वी का उपभोग करता है और वही राजा वस्तुतः राजा है।
पराक्रमो बलं बुद्धिः शौर्यमेते वरा गुणाः।
एभिर्हीनोऽन्यगुणयुग्महीभुक् सधनोऽपि च ॥ १७६ ॥
महीं स्वल्पां नैव भुंक्ते द्रुतं राज्याद्विनश्यति।
महाधनाच्च नृपतेर्विमात्यल्पोऽपि पार्थिवः ॥ १७७ ॥
अव्याहताज्ञस्तेजस्वी एभिरेव गुणैर्भवेत्।
राज्ञः साधारणास्त्वन्ये न शक्ता भूप्रसाधने ॥ १७८ ॥
पराक्रम, बल, बुद्धि, शूरता ये श्रेष्ठ गुण कहलाते हैं। इन गुणों से हीन होकर यदि इनसे भिन्न गुणों से युक्त भी हो और धनवान भी हो तो वह राजा थोड़ी भी भूमि का स्वामी नहीं होता है और यदि हो तो उसका राज्य शीघ्र नष्ट हो जाता है। महाधनवान् राजा की अपेक्षा छोटा राजा भी सुशोभित होता है क्योंकि पराक्रमादि इन्हीं गुणों से उसकी आज्ञा नहीं टाली जाती है और वह तेजस्वी होता है। राजा के इससे भिन्न सभी गुण साधारण माने जाते हैं उनसे पृथ्वी-पालन या राज्य का विस्तार नहीं हो सकता है।