शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ · शुक्रनीतिः
और सोने के लिये, विहार, जलपान तथा रोदन करने के लिये, धान्य आदि तथा जांत रखने के लिये, दासी-दासों के रहने के लिये एवं मल-मूत्रादि त्याग करने के लिये क्रम से ( सिलसिलेवार ) गृह दक्षिण दिशा में बनवावे । और गो, मृग, ऊंट, हाथी आदि के लिये पश्चिम दिशा में गृह बनवावे ।
रथवाज्यस्त्रशस्त्रार्थं व्यायामायामिकार्थकम् ।
वस्त्रार्थकं तु द्रव्यार्थं विद्याभ्यासार्थमेव च ॥ २२६ ॥
उदग्गृहान् प्रकुर्वीत सुगुप्तान् सुमनोहरान् ।
यथासुखानि वा कुर्याद् गृहाण्येतानि वै नृपः ॥ २२७ ॥
रथ, घोड़े, अस्त्र, शस्त्र के लिये, कसरत का विस्तार करने के लिये, वस्त्र तथा द्रव्य रखने एवं विद्याभ्यास करने के लिये सुरक्षित तथा सुन्दर गृह उत्तर दिशा में बनवाये । अथवा राजा अपनी सुविधा के अनुसार इन सब गृहों को बनवावे ।
धर्माधिकरणं शिल्पशालां कुर्यादुदग्गृहात् ।
पंचमांशाधिकोच्छ्राया भित्तिर्विस्तारतो गृहे ॥ २२८ ॥
राजा भवन से उत्तर दिशा की ओर कचहरी और शिल्पशाला ( चित्रादि-गृह ) बनवावे । गृह की लम्बाई से पांचवें भाग के बराबर ऊंची भीत बनवावे ।
कोष्ठविस्तारषष्ठांशस्थूला सा च प्रकीर्तिता ।
एकभूमेरिदं मानमूर्ध्वमूर्ध्वं समं ततः ॥ २२९ ॥
कोठरी के लम्बान से छठवां भाग के समान मोटी भीत उठानी चाहिये । यह एक मञ्जिले मकान के लिये मान कहा है । इसके बाद ऊपर-ऊपर के अन्य मंजिलों का भी इसी भांति समझना चाहिये ।
स्तम्भैश्च भित्तिभिर्वापि पृथक्कोष्ठानि संन्यसेत् ।
त्रिकोष्ठं पञ्चकोष्ठं वा सप्तकोष्ठं गृहं स्मृतम् ॥ २३० ॥
स्तम्भों अथवा भित्तियों से पृथक् कोठरियों को बनवावे । और एक गृह में ३-५ अथवा ७ कोठरियां बनवावे ।
द्वारार्थमष्टधा भक्तं द्वारस्यांशौ तु मध्यमौ ।
द्वौ द्वौ ज्ञेयौ चतुर्दिक्षु धनपुत्रप्रदौ नृणाम् ॥ २३१ ॥
द्वार बनाने के लिये गृह के आठ भाग करके उसमें से बीच के दो भागों में द्वार बनाना चाहिये । इसी भांति से चारो दिशाओं में मध्यम के दो २ भागों में द्वार बनाना चाहिये । ऐसे द्वार मनुष्यों के धन तथा पुत्र देनेवाले होते हैं ।